जहां पड़े राहुल के चरण, वहां खिले कमल!

  • 19 Dec 2017
  • Reporter: समाचार फर्स्ट

'जहां-जहां राहुल गांधी जाते हैं, वहां-वहां बीजेपी जरूर जीतती है।'
'राहुल गांधी कांग्रेस के नहीं बल्कि बीजेपी के स्टार प्रचारक हैं'

दअरसल, ये वो जुमले थे जिनका इस्तेमाल बीजेपी के बड़े-बड़े नेता हिमाचल चुनाव के दौरान कर रहे थे। बीजेपी नेताओं के बयानों को चुटकिले भरे अंदाज में लिया जा सकता है, लेकिन चुनाव बाद जो परिणाम आए हैं, उसे देखते हुए अंधविश्वास वाली सोच भी हावी होती दिखाई दे रही है। लोगों के बीच सवाल यही उठ रहे हैं कि क्या वाकई राहुल गांधी जहां-जहां गए, कांग्रेस प्रत्याशी चुनाव हार गए?

ये सवाल तब और परेशानी पैदा करने लगते हैं जब चौक-चौराहों पर लोग इस बात पर बहस कर रहे हों। धर्मशाला के दाड़ी ग्राउंड पर मेला लगने जा रहा है, लेकिन मेले से ज्यादा यहां लोग हिमाचल के चुनाव परिणाम पर चर्चा कर रहे थे। परिणामों पर चर्चा होते-होते हार-जीत के फैक्टर्स पर बहस होने लगी। लेकिन, इस बहस में राहुल गांधी फैक्टर काबिल-ए-गौर रहा। एक सज्जन बड़े ही धौंस के साथ धर्मशाला से कांग्रेस प्रत्याशी रहे सुधीर शर्मा की हार के लिए राहुल गांधी को जिम्मेदार ठहराया। उनकी इस बात पर जब सवाल उठे तो उन्होंने तपाक से अचकचा देने वाला तर्क पेश कर दिया। सज्जन ने अपनी बात को धार देने के लिए उन जगहों का जिक्र किया जहां-जहां राहुल गांधी गए थे और कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।

पुराने ट्रेंड को हथियार बनाकर उस सज्जन ने कहा, '' राहुल गांधी ने धर्मशाला के अलावा मंडी और चंबा जिले का दौरा किया। यहां पर कांग्रेस की हालत क्या रही है यह दिखाई दे रहा है। सबसे बड़ी बात कि नगरोटा बगवां विधानसभा से जीएस बाली की हार हो गई। कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था कि बाली को नगरोटा की जनता हराएगी। लेकिन, नगरोटा में भी राहुल गांधी एक बार नहीं बल्कि दो-दो बार गए थे।"

मजाकिया अंदाज में अपना तर्क पेश करने वाले सज्जन यहीं नहीं रुके बल्कि राहुल के साथ राहु'काल' का भी प्रत्यय जोड़ दिया। उनका कहना था कि मंडी में अनिल शर्मा ने राहुल के राहु'काल' से बचने के लिए ऐन मौके पर पार्टी छोड़ अपना ग्रह-संकट दूर कर लिया। वर्ना चंपा ठाकुर की जगह वो नप जाते।

भारतीय राजनीति में निसंदेह टोटकों और अंधविश्वास का बोलबाला रहता है। जनता  नहीं बल्कि खुद नेता कई टोटकों को आजमाते हुए दिखाई देते हैं। लेकिन, अगर टोटकेबाजी ही चुनावी विश्लेषण का मुद्दा बन जाए तो यह बेहद हास्यासपद है।