माँ सिमसा की अनोखी महिमा, 'सलिन्दरा' देकर भरती है महिलाओं की सुनी गोद

  • 18 May 2018
  • Reporter: पी. चंद

देव भूमि हिमाचल ऐसी पावन स्थली है जहाँ के चप्पे-चप्पे में देवी-देवता रमण करते है। ऐसा ही संतान दात्री माता का मंदिर मंडी जिले के लड-भड़ोल तहसील में स्थित है। जिसको माता सिमसा के नाम से जाना जाता है। सिमसा माता मंदिर में माता स्वयंभू विद्यमान हैं। सैंकड़ों वर्षो पूर्व देवी सिमसा ने ग्वाले के हाथों अपनी मूर्ति की स्थापना करवाई थी। तब से ये मन्दिर भक्तों की गूढ़ आस्था का केन्द्र है।

माता सिमसा या देवी सिमसा को संतान-दात्री के नाम से भी जाना जाता है। हर वर्ष यहाँ सैंकड़ो नि:सन्तान महिलाएं सन्तान पाने की इच्छा लेकर माता सिमसा के दर पर आते हैं। माता सिमसा मंदिर में नवरात्रों में होने वाले इस विशेष उत्सव को स्थानीय भाषा में “सलिन्दरा” कहा जाता है। सलिन्दरा का अर्थ है स्वप्न अथवा ड्रीम है। नवरात्रों में संतान की चाह रखने वाली महिलाएं माता सिमसा मंदिर परिसर में डेरा डालती हैं और दिन रात मंदिर के फर्श पर सो जाती है और तब तक नही जागती है, जब तक कि माता सिमसा स्वप्न में आकर उनकी सुनी गोद नही भर देती। विश्वास है कि जो महिलाएं माता सिमसा के प्रति मन में श्रद्धा लेकर से मंदिर में आती है माता सिमसा उन्हें स्वप्न में मानव रूप में या प्रतीक रूप में दर्शन देकर संतान का आशीर्वाद प्रदान करती है।

मंदिर जा चुकी महिलाएं बताती है कि यदि कोई महिला स्वप्न में कोई कंद-मूल या फल प्राप्त कर लेती है तो उस महिला को अवश्य ही संतान का प्राप्ति का आशीर्वाद मिल जाता है। देवी सिमसा आने वाली संतान के लिंग-निर्धारण का भी संकेत देती हैं। जैसे कि, यदि किसी महिला को अमरुद, केला, आम आदि का फल मिलता है तो समझ लें कि लड़का होगा। यदि किसी को स्वप्न में भिन्डी, मिर्च आदि देती है तो समझें कि संतान के रूप में लड़की प्राप्त होगी। यदि किसी को धातु, लकड़ी या पत्थर या राख आदि दिखें तो मान जाता है कि उसके संतान नहीं होगी। इसके अलावा स्वप्न में फल देने के बाद भी कोई महिला बिस्तर ने छोड़ती है तो उसको चींटियां लग जाती है।

संतान प्राप्ति के बाद दंपति माता का आभार व्यक्त करने सगे-सम्बन्धियों और कुटुंब के साथ दोबारा दर्शन करने आते हैं। सिमसा माता से आशीर्वाद प्राप्त करने वाले ऐसे कई दम्पति मिल जाते हैं जिन्हें माता के स्वप्न देने के बाद संतान की प्राप्ति हुई। इसे संयोंग” कहें या माता का चमत्कार इस मंदिर में कोई तो बढ़ी शक्ति है जो यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं के अटूट विश्वास को सुदृढ़ करती है। जो ज्ञान-विज्ञान और मानवीय समझ से परे है।

माता सिमसा मंदिर पक्के सड़क संपर्क मार्ग से जुड़ा है। यहाँ वर्ष भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। खासतौर पर नवरात्रों में यहाँ भीड़ अधिक रहती है तथा उत्सव का माहौल होता है। गर्मियों के मौसम में यहाँ 2 दिवसीय मेला लगता है जिसमे दूर -दूर से लोग माँ के दरबार में हाजरी भरने आते हैं। सिमसा माता-मन्दिर बैजनाथ से मात्र 25 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। जोगिन्दर नगर से माँ का मंदिर लगभग 50 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। मंदिर के लिए एक कम दूरी वाला रास्ता वाया गोलवाँ भी है। मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर अन्य दर्शनीय स्थान स्थित है जिसे कुड्ड कहा जाता है।

किवदंती के अनुसार इस स्थान पर भगवान् शिव ने कुछ समय तपस्या की थी. मंदिर से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर एक बहुत बड़ा पत्थर है जो एक उंगली से हिलाया जाता है। यदि पत्थर को पूरे हाथ से या फिर जोर से हिलाया जाए तो पत्थर नही हिलता है जबकि एक उंगली से हिल जाता है।