सबकी आशा पूरी करती है मां 'आशापुरी', टीले पर मौजूद मंदिर की है अनोखी महिमा

  • 21 May 2018
  • Reporter: पी. चंद

देवभूमि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला के तहसील पालमपुर में पहाड़ी की चोटी पर माता आशा पूरी का मंदिर स्थित है। पंचरुखी के निकट चंगर की वादियों में पवित्र टीले पर स्थित शक्तिपीठ मां आशापुरी जो सभी भक्तों की मनोकामनाओं को पूरा करती है। अपनी बेजोड़ वास्तुशिल्प के लिए चर्चित इस मंदिर की अपनी गाथा है। इस मंदिर की देखरेख पुरातत्त्व विभाग करता है।  इस सिद्धपीठ का उल्लेख  देवी भागवत पुराण में मिलता है।  माना जाता है कि आशापुरी मंदिर भी पांडवों द्वारा बनाए गए अज्ञातवास  वनवास”  के दौरान बनाया गया मंदिर है।

पांडवों ने करवाया मंदिर का निर्माण

कहा जाता है कि द्वापर युग में पांडव अपने अज्ञात वास के दौरान मां आशापुरी से चार किलोमीटर की दूरी पर मल्ली की गुफाओं में भी कुछ दिन रहे थे। जब कर्ण पांडवों के अज्ञात वास को भंग करने मल्ली की गुफाओं में पहुंचा तो वहां उसे पांडव तो नहीं मिले, लेकिन उसे आशापुरी माता के दर्शन हुए और उसने आशापुरी की पिंडी को ढूंढ निकाला और वहां भव्य मंदिर का निर्माण करवाया जो वर्तमान में आशापुरी के नाम से प्रसिद्ध है। 

दूध बेचने वाले को दिए मां ने सपने में दर्शन

आशापुरी मंदिर से दो किलोमीटर की दूरी पर माता वैष्णो पिंडी रूपों प्रकट हुई है। एक दूध बेचने वाले को मां ने सपने में दर्शन दिए। सुबह जब उसने सपने में दिखी गुफा का एक पत्थर हटाया तो वहां आगे का रास्ता खुद बना हुआ था। जब वह उस रास्ते से अंदर गया तो वहां पर माता वैष्णो की तीन पिंडिया और पत्थर के बने हुए अन्य देवी-देवता मिले। यही से थोड़ी दूर पर गुफा में बाबा भेड़ू नाथ के दर्शन होते हैं जहां पर लोग अपने पशु की रक्षा के लिए बाबा से मन्नतें मांगते हैं।

पालमपुर से माता अशापुरी तक की दूरी 25 किलोमीटर है पालमपुर से आशापुरी तक यह 2-3 घंटे का समय लगेगा। बस सेवा या आप पालमपुर से एक टैक्सी भी कर सकते हैं रास्ते में आप देख सकते हैं कि आशापुरी हरी पहाड़ियों, छोटी नदियों, छोटे झरनों आदि के आसपास हैं, जो आपको  मन की शांति और अविश्वसनीय यात्रा अनुभव देता है।

लोगों का कहना है कि इस क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की काफी संभावनाएं हैं।  प्राकृतिक सौंदर्य एवं खूबसूरत वादियों में बने इस मन्दिर को सही ढंग से विकसित किया जाए तो विश्वभर में इस शक्तिपीठ की एक अलग पहचान बन सकती है।