कमज़ोर सरकार पर न्यायपालिका का चाबुक, अपनी जिम्मेदारियों से भागती है कार्यपालिका

  • 20 Jun 2018
  • Reporter: पी. चंद

विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका ये लोकतंत्र के तीन प्रमुख आधार स्तंभ माना जाते है। इसमें चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया को शामिल किया गया। कहा जाता है कि किसी भी लोकतंत्र की सफलता के लिए ये चारों स्तंभ मजबूत होना जरूरी है। ये तभी होगा जब चारों अपना-अपना कार्य पूरी जिम्मेदारी और निष्ठा से करें। लेकिन, सरकारें अपना काम शायद बख़ूबी ढंग से निभा नहीं पा रही है परिणामस्वरूप न्यायपालिका को कई मसलों पर दखल करना पड़ रहा है।

अब यदि हिमाचल प्रदेश की ही बात करें तो कई मसलों में न्यायालय ने सरकार को फटकार, लताड़ और दिशानिर्देश दिए। फिर चाहे बात अवैध निर्माण से उत्तपन्न स्थिति की हो, पानी के किल्लत के मसले की हो, एनएच का मामला हो, स्कूल बस एक्सीडेंट के बाद की स्थिति हो या फिर शिमला की बिगड़ती यातायात व्यवस्था, इन मुद्दों पर सरकार के अधिकारी अफ़सर कोर्ट के चक्कर लगाते मिलते हैं। ऐसा नहीं है कि जयराम सरकार सरकार की गलतियों के कारण ही न्यायालय को जनहित के लिए आगे आना पड़ा और सरकार को परिस्थितियों से निबटने के आदेश देने पड़े। बल्कि पिछली वीरभद्र सरकार के दौरान भी कई मसलों पर कोर्ट ने सरकार को चेताया और प्रदेश हित में आदेश जारी करने पड़े।

इससे क्या समझा जाए कि सरकार व व्यवस्थाओं में इतना खोट है कि गुड़िया व कसौली गोलीकांड जैसे संवेदनशील मामलो पर भी कोर्ट के आदेश से कार्यवाही आगे बढ़ती है और सड़क पानी जैसी बुनियादी जरूरतों पर भी कोर्ट को संज्ञान लेना पड़ता है। फिर सरकार का काम क्या रह गया ? क्या सरकारें सिर्फ चुनावी जीत हार के अंकगणित में इतनी उलझ जाती है कि उनको देश हित व लोक हित के स्थान और स्वयं का हित नज़र आता है। या फिर हमारे देश की व्यवस्था इतनी बिगड़ गई है कि उसको सुधारने के लिए हमेशा न्याय के चाबुक की जरूरत है?