अपना वजूद तलाश रहा ऐतिहासिक "अलसिंडी बंगला", लोक निर्माण विभाग कर रहा अनदेखी

  • 11 Jan 2019
  • Reporter: पी.चंद

सुकेत रियासत के समय में राज्य रेस्ट हॉउस का दर्जा पाने वाला अलसिंङी बंगला आज अपना वजूद खो बैठा है। अंग्रेजी हुकूमत के समय जब लोग पैदल शिमला आवाजाही करते थे तो अलसिंङी रेस्ट हाउस में विश्राम किया करते थे। 18वीं शताब्दी में बने अलसिंङी बंगले की ईमारत की महत्वत्ता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी स्थानीय लोग अलसिंङी गांव को बांगला के नाम से पुकारते है । इस रेस्ट हाउस का जिक्र 1927 में छपी "गैज़ेटर ऑफ़ सूकेत स्टेट" में भी किया गया है। पुस्तक में भी इसे स्टेट रेस्ट हाउस के रूप में दर्शाया गया है।

ब्रिटिश शासन के दौरान राजा-रजवाड़ों और अफसरशाही के लिए अलसिंङी में निर्माण किया गया स्टेट रेस्ट हाउस आज जिस तरह से लकड़ी पत्थर पर मजबूती से खड़े होते हुए मुरम्मत की राह देख रहा है इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि "अलसिंङी बांग्ला" कभी बुलंद इमारत के रूप में भी रहा है। आपको बता दें कि आजादी के बाद से  इस बहुमूल्य रेस्ट हाउस की देखरेख का जिम्मा लोक निर्माण विभाग के पास है।

लेकिन विभाग ने इस कदर इस ऐतिहासिक धरोहर की अनदेखी की है कि आज अलसिंङी बंगला की ऐतिहासिक ईमारत अपना अस्तित्व तलाश रही है। लिखित में तथ्यों के आधार पर यह रेस्ट हाउस शिमला से आगे करसोग क्षेत्र की ओर इतना महत्वपूर्ण रहा है कि अंग्रेजी हुकूमत के समय सुकेत रियासत के राजा जब क्षेत्र का दौरा करते थे तो अलसिंङी के इस स्टेट रेस्ट हाउस में रुकते थे। साथ ही क्षेत्र के लोगों की समस्याओं का निपटारा भी इसी भवन में करते थे।

1927 में छपी "गैजेट ऑफ़ सुकेत" में भी इस रेस्ट हाउस की पूरी जानकारी दी गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर इस भवन की समय-समय पर मरम्मत होती और रहने काबिल ध्यान दिया जाता तो निश्चित तौर पर ब्रिटिश शाशन के दौरान बनाये भवन, राजा रजवाड़ों को ठहरने की सुविधा देते हुए आज भी प्रदेश भर में धरोहर भवन के रूप में दर्ज होता। परन्तु आधुनिकता की दौड़ में अलसिंङी के इस ऐतिहासिक भवन को भुला दिया गया है। स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां एक सुन्दर पार्क भी हुआ करता था इसमें अनेकों प्रकार के फूल-खिले होते थे। जिससे इस भवन की सुंदरता देखते ही बनती थी ।

स्थानीय लोग बताते है कि लगभग 45 वर्ष पहले जब हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी उस समय मंत्री रहे लाल चंद प्रार्थी भी इसी रेस्ट हाउस में रुके थे। उन्होंने यहां उपजाऊ भूमि तथा पशुधन को देखते हुए कहा था कि अलसिंङी में मिल्क प्लांट होना चाहिए। जबकि सुकेत रियासत के राजा और अन्य राजा भी इस स्टेट रेस्ट हाउस की छत का आनंद अपने लाव-लश्कर सहित अनेकों दफा ले चुके हैं।

अलसिंङी बंगला की इस कदर बेकद्री और इसका पुनःनिर्माण क्यों नहीं हुआ? इसके निर्माण के लिए विभाग ने क्या प्रयास किये गई है? अलसिंङी निवासी अधिवक्ता गुणा नन्द वर्मा ने इन सब सवालों का जवाब आरटीआई के माध्यम से लोक निर्माण विभाग से मांगा है। जिसके जवाब में विभाग ने साफ़ कह दिया है कि लोक निर्माण विभाग के पास इस ऐतिहासिक भवन के पुनः निर्माण के लिए बजट नहीं है अगर सरकार धन मुहैया करवाती है तो इसका पुनः निर्माण हो सकता है। उन्होंने कहा कि अलसिंङी बंगला की ऐतिहासिक ईमारत खंडहर का रूप लेती जा रही है जिस ओर लोक निर्माण विभाग का कोई ध्यान नहीं है। उन्होंने प्रदेश सरकार से मांग की है कि यहां फिर से रेस्ट हाउस का निर्माण किया जाये ताकि अलसिंङी बंगला का अस्तित्व बच सके ।  

वहीं अलसिंङी बंगला की प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने के लिए भाषा एवं संस्कृति विभाग ने पहल की है। भाषा एवं संस्कृति विभाग के निर्देशक के के शर्मा ने बताया कि इस रेस्ट हाउस का मामला उनके धयान में गया है। जिसको लेकर एक विशेष टीम भवन का निरिक्षण करने के लिए भेजी गई है उसमे भवन के 100 सालों  के तथ्य सामने आये है उन्होंने कहा कि रिपोर्ट आने तक आगामी कार्रवाही अमल में लेट हुए इस भवन को बचने के लिए हर संभव प्रयास किये जायेंगे ताकि इसकी ऐतिहासिक महत्वता को संजोया जा सके।

गौरतलब कि अलसिंङी बंगला में स्थित ब्रिटिश शाशन के समय स्टेट रेस्ट हाउस का दर्जा पाने वाले इस भवन में ठहरने के लिए दो सेट, एक बड़ा हॉल एक स्टोर ,बाथरूम ,रसोई और चोकीदार के ठहरने के लिए अलग से वयवस्था है। जबकि भवन तक पहुंचने के लिए वाहन सुविधा उपलब्ध है। लेकिन पिछले कई वर्षों से लोक निर्माण विभाग ने टुटा-फूटा सामान डालने का स्थान बनाया हुआ है।