रहस्यों से भरा है कामाख्या मंदिर, यहां देवी की मूर्ति नहीं योनि भाग की होती है पूजा

  • 29 Sep 2019
  • Reporter: पी. चंद

शारदीय नवरात्र शुरू हो चुके है इन नवरात्र का हिंदुओं में अपना अलग स्थान है। इस दौरान भारत के 51 शक्तिपीठों में भक्तों का तांता लगा रहता है। आज हम आपकों 51 शक्तिपीठों में से एक कामाख्या मंदिर के रहस्य के बारे में बताने जा रहे हैं। 51 शक्तिपीठों में से सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाला यह मंदिर रजस्वला माता की वजह से ज़्यादा ध्यान आकर्षित करता है। मंदिर में चट्टान के रूप में बनी योनि से आज भी रक्त निकलता है।

इस मंदिर में कोई भी मूर्ति नहीं है। यहां सिर्फ योनि रूप में बनी एक समतल चट्टान को पूजा जाता हैं। इतना ही नहीं यहां दिया जाने वाले वाला प्रसाद भी रक्त से सना कपड़ा होता है। इस मंदिर में पशुओं की बली भी दी जाती है। लेकिन यहां किसी भी मादा जानवर की बलि नहीं दी जाती है।

माना जाता है कि देवी सती द्वारा भगवान शिव से की शादी से पिता दक्ष खुश नहीं थे। राजा दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया जिसमें सती के पति भगवान शिव को न्यौता नहीं दिया गया। सति इस बात से नाराज़ हुईं और बिना बुलाए अपने पिता के घर पहुंच गई। पिता दक्ष ने सती व शिव का खूब अपमान किया। सती अपने पति का अपमान सहन नही कर पाई और हवन कुंड में कूद कर जान दे दी।

इस बात का पता जब भगवान शिव को चला तो वह यज्ञ में पहुंचे और सति का शव लेकर विचरने लगे शिव की हालत देखकर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती  का शव 51 हिस्सों में विभाजित कर दिया जो कटकर जगह-जगह गिरा। इसमें सती की योनि और गर्भ इसी कामाख्या मंदिर के स्थान यानी निलाचंल पर्वत पर गिरा।

इसी की पूजा आज इस मंदिर में होती है। इस स्थान पर 17वीं सदी में बिहार के राजा नारा नारायणा ने मंदिर बनाया। यहां हर साल एक मेला लगता है। माना जाता है कि इस मेले में देशभर के तांत्रिक आते हैं।

ऐसी मान्यता है कि इन तीन दिनों में माता सति रजस्वला होती हैं और जल कुंड में पानी की जगह रक्त बहता है। इन तीन दिनों के लिए मंदिर के दरवाजे बंद रहते हैं। तीन दिनों के बाद दरवाज़े खोले जाते है। हर साल मेले के दौरान ब्रह्मपुत्र नदी का जल भी लाल हो जाता है। ऐसा माना जाता है कि ये पानी माता के रजस्वला होने का कारण होता है।

ऐसा कहा जाता है कि तीन दिन जब मंदिर के दरवाजे बंद किए जाते हैं तब मंदिर में एक सफेद रंग का कपड़ा बिछाया जाता है जो मंदिर के कपाट खोलने तक लाल हो जाता है। इसी लाल कपड़े को इस मेले में आए भक्तों को दिया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस कपड़े को जो भी कोई अपने पास रखता है उस पर कोई विघ्न बाधा नहीं आती है।