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हिमाचल का ऐतिहासिक राजभवन: जहां हुआ था भारत-पाक शिमला समझौता

1832 में निर्मित बार्न्स कोर्ट अब कहलाता है हिमाचल राजभवन
1972 में शिमला समझौते का साक्षी रहा यह ऐतिहासिक भवन
पीटरहॉफ में आग लगने के बाद 1981 में बना राज्यपाल का आधिकारिक निवास

पराक्रम चंद


हिमाचल प्रदेश का राजभवन, जो आज राज्यपाल का आधिकारिक निवास है, अपने भीतर लगभग दो शताब्दियों का इतिहास समेटे हुए है। यह भवन पहले बार्न्स कोर्ट के नाम से जाना जाता था और 1832 में निर्मित इस इमारत ने भारत के औपनिवेशिक दौर से लेकर आधुनिक काल तक कई ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षात्कार किया है।

शिमला स्थित इस भवन का नाम ब्रिटिश भारत के कमांडर-इन-चीफ एडवर्ड बार्न्स के नाम पर रखा गया था। उन्होंने इसे एक आवासीय भवन के रूप में उपयोग करना शुरू किया था। इस इमारत की स्थापत्य शैली नव-ट्यूडर आर्किटेक्चर पर आधारित है, जो लकड़ी से निर्मित ब्रिटिश युग की कलात्मक पहचान रही है।

1849 से 1864 तक बार्न्स कोर्ट कई ब्रिटिश कमांडरों का निवास स्थान बना रहा। 1857 के महान विद्रोह की खबर भी यहीं पर तत्कालीन कमांडर-इन-चीफ जनरल एसन को दी गई थी — यह तथ्य इसे औपनिवेशिक भारत की प्रमुख सैन्य घटनाओं से जोड़ता है।

स्वतंत्र भारत में, जब 1971 में हिमाचल प्रदेश पूर्ण राज्य बना, तब राज्यपाल का निवास पीटरहॉफ भवन में था। लेकिन 12 जनवरी 1981 की रात को वहां भीषण आग लग गई, जिसने इमारत को पूरी तरह नष्ट कर दिया। इसके बाद राजभवन को बार्न्स कोर्ट भवन में स्थानांतरित कर दिया गया और तब से यही भवन हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का आधिकारिक निवास है।

बार्न्स कोर्ट की ऐतिहासिकता का एक और स्वर्णिम अध्याय है 1972 का शिमला समझौता। यही वह स्थान है, जहां भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फीकार अली भुट्टो ने 3 जुलाई 1972 को ऐतिहासिक शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसने भारत-पाक संबंधों की नई दिशा तय की।

आज यह भवन राजभवन शिमला के रूप में हिमाचल की राजकीय गरिमा, स्थापत्य धरोहर और ऐतिहासिक स्मृतियों का प्रतीक है। यह न केवल राज्यपाल का निवास है, बल्कि हिमाचल की सांस्कृतिक पहचान और ब्रिटिश कालीन स्थापत्य सौंदर्य का एक जीवंत उदाहरण भी है।