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मकर संक्रांति पर तत्तापानी में आस्था का महास्नान, गर्म पानी के कुंडों में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

➤ मकर संक्रांति पर सैकड़ों श्रद्धालुओं ने तत्तापानी के गर्म जल कुंडों में लगाई आस्था की डुबकी

➤ सल्फर युक्त जल से चर्म रोग दूर होने की मान्यता, सुबह 4 बजे से शुरू हुआ स्नान

➤ 97वीं बार बनी खिचड़ी, हजारों भक्तों को कराया गया भंडारा


मकर संक्रांति के पावन अवसर पर हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल तत्तापानी में आस्था का अद्भुत नज़ारा देखने को मिला। सुबह 4 बजे से ही सैकड़ों श्रद्धालु गर्म पानी के कुंडों में स्नान कर पुण्य लाभ कमा रहे हैं। शिमला से 56 किलोमीटर दूर स्थित यह स्थल अपनी सल्फर युक्त जलधाराओं के लिए जाना जाता है, जहां स्नान करने से त्वचा रोग दूर होने की मान्यता है।

तत्तापानी में कुंड में स्नान करते हुए श्रद्धालु।

तत्तापानी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां धरती के भीतर से गर्म पानी निकलता है, जिससे सर्दियों में भी श्रद्धालु आराम से स्नान कर पाते हैं। इन दिनों क्षेत्र का तापमान 4 से 6 डिग्री के बीच बना हुआ है, इसके बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था में कोई कमी नहीं दिखी।

मकर संक्रांति के मौके पर यहां तुलादान की परंपरा भी निभाई जा रही है। बड़ी संख्या में लोग ग्रह शांति के लिए दान-पुण्य कर रहे हैं।


शिमला के तत्तापानी में तुलादान करवाते हुए लोग।

97वीं बार बनी खिचड़ी, फिर रचा इतिहास

शिमला निवासी ने बताया कि उनके पूर्वज पिछले 96 वर्षों से मकर संक्रांति पर तत्तापानी में खिचड़ी का भंडारा आयोजित करते आ रहे हैं। इस बार 97वीं बार करीब 3 क्विंटल खिचड़ी तैयार की गई, जिसे हजारों श्रद्धालुओं को परोसा गया।

इससे पहले साल 2020 में यहां 4.5 क्विंटल खिचड़ी बनाकर वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बनाया जा चुका है। यह परंपरा उनके पूर्वज बिहारी लाल ने शुरू की थी, जिसे आज भी परिवार पूरी श्रद्धा से निभा रहा है।


ऋषि जमदग्नि और परशुराम की तपोस्थली

तत्तापानी को ऋषि जमदग्नि और भगवान परशुराम की तपोस्थली के रूप में जाना जाता है। मान्यता है कि त्रेता युग में ऋषि जमदग्नि ने अपनी पत्नी रेणुका और पुत्र परशुराम के साथ यहां गुफा में तपस्या की थी।

यहां के सल्फर युक्त गर्म जल को औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है, जिससे चर्म रोग और अन्य त्वचा संबंधी समस्याएं दूर होती हैं।


कैसे पड़ा तत्तापानी नाम?

लोकल भाषा में ‘तत्ता’ का मतलब होता है गर्म, और ‘पानी’ यानी जल। सतलुज नदी के किनारे बसे इस क्षेत्र में करीब एक किलोमीटर तक गर्म जलधाराएं बहती हैं, जिस कारण इसका नाम तत्तापानी पड़ा।

साल 2013 में कौल डैम बनने के बाद पुराना सरोवर जलमग्न हो गया था, लेकिन बाद में जियोलॉजिकल सर्वे के जरिए नदी किनारे दोबारा गर्म पानी निकाला गया और श्रद्धालुओं के लिए नए कुंड बनाए गए।


तत्तापानी सरोवर का पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था उद्घाटन।

कैसे पहुंचें तत्तापानी?

शिमला–करसोग हाईवे से होकर तत्तापानी पहुंचा जा सकता है।

  • शिमला से दूरी: 56 किमी

  • मंडी से दूरी: 120 किमी

  • करसोग से दूरी: 45 किमी

छोटा सा गांव होने के बावजूद धार्मिक आस्था और गर्म पानी के कुंडों की वजह से यह क्षेत्र एक बड़ा पर्यटन केंद्र बन चुका है।