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हिमाचल में 108-102 एंबुलेंस कर्मियों को बड़ी राहत, अब खाते में आएगी पूरी 15 हजार रुपये सैलरी

हाईकोर्ट ने 108-102 एंबुलेंस कर्मियों की 15 हजार रुपये इन-हैंड सैलरी पर लगाई मुहर
पीएफ और ईएसआई की कटौती 15 हजार रुपये के वेतन में शामिल नहीं होगी
जीवीके कंपनी को दो महीने में बकाया वेतन चुकाने का आदेश


हिमाचल प्रदेश में 108 और 102 नेशनल एंबुलेंस सर्विस के पायलटों और इमरजेंसी मेडिकल टेक्नीशियनों (ईएमटी) के लिए राहत भरी खबर है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि 15 हजार रुपये की टेक होम सैलरी का मतलब कर्मचारी के बैंक खाते में आने वाली वास्तविक इन-हैंड राशि है। इसमें भविष्य निधि (पीएफ) और कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई) जैसी वैधानिक कटौतियों को शामिल नहीं किया जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने पूर्ण चंद की ओर से दायर निष्पादन याचिका को स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने जीवीके इमरजेंसी मैनेजमेंट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट को निर्देश दिया है कि पात्र कर्मचारियों को संबंधित अवधि के लिए 15 हजार रुपये प्रति माह की पूरी टेक होम सैलरी सुनिश्चित की जाए।

फैसले का सीधा असर उन कर्मचारियों पर पड़ेगा, जिन्हें कंपनी की ओर से 15 हजार रुपये की राशि को कुल लागत यानी कॉस्ट टू कंपनी मानकर उसमें पीएफ, ईएसआई और ग्रेच्युटी जैसी मदों को शामिल करने के बाद कम वास्तविक वेतन दिया जा रहा था।

कोर्ट ने साफ किया- 15 हजार रुपये का मतलब खाते में आने वाली पूरी राशि

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने टेक होम सैलरी की स्पष्ट व्याख्या की। अदालत ने कहा कि टेक होम सैलरी वह वास्तविक खर्च करने योग्य राशि है, जो करों और वैधानिक कटौतियों के बाद कर्मचारी के बैंक खाते में जमा होती है।

इसका अर्थ यह हुआ कि अगर किसी कर्मचारी के लिए 15 हजार रुपये टेक होम वेतन तय किया गया है तो कंपनी पीएफ और ईएसआई जैसे वैधानिक भुगतान को उसी 15 हजार रुपये में समायोजित करके कर्मचारी की वास्तविक सैलरी कम नहीं कर सकती।

अदालत ने स्पष्ट किया कि पीएफ और ईएसआई का भुगतान करना कंपनी की वैधानिक जिम्मेदारी है। इन्हें कर्मचारी की इन-हैंड सैलरी का हिस्सा बताकर 15 हजार रुपये के भीतर शामिल नहीं किया जा सकता।

इस आदेश से उन कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है, जिनका वास्तविक वेतन कंपनी की व्याख्या के कारण 15 हजार रुपये से काफी कम रह गया था।

कंपनी ने 15 हजार रुपये को कॉस्ट टू कंपनी माना, कर्मचारियों के हाथ में आए कम पैसे

विवाद की मुख्य वजह कंपनी और कर्मचारियों के बीच 15 हजार रुपये की टेक होम सैलरी की व्याख्या को लेकर थी। कंपनी ने इस राशि को कॉस्ट टू कंपनी के रूप में माना। इसके तहत पीएफ, ईएसआई और ग्रेच्युटी जैसी मदों को भी इसी राशि के भीतर शामिल कर दिया गया।

इस व्यवस्था का सीधा असर कर्मचारियों की जेब पर पड़ा। 15 हजार रुपये की तय राशि के बावजूद कर्मचारियों के बैंक खातों में करीब 11,545 रुपये से लेकर 12,908 रुपये तक ही पहुंच रहे थे।

कर्मचारियों ने कंपनी की इस व्यवस्था का विरोध किया। उनका कहना था कि जब अदालत ने 15 हजार रुपये टेक होम वेतन देने का निर्देश दिया है तो उन्हें पूरे 15 हजार रुपये इन-हैंड मिलने चाहिए। पीएफ और ईएसआई जैसी वैधानिक देनदारियों को कंपनी को अलग से वहन करना चाहिए।

इसी मांग को लेकर कर्मचारियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और पूर्व में दिए गए हाईकोर्ट के आदेश को लागू करवाने की मांग की।

2020 में हाईकोर्ट ने दिया था 15 हजार रुपये वेतन बढ़ाने का आदेश

यह मामला उस समय का है जब हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 8 जनवरी 2020 को जीवीके कंपनी को महत्वपूर्ण निर्देश दिया था। अदालत ने विवाद का समाधान होने तक प्रत्येक पायलट और ईएमटी का टेक होम वेतन बढ़ाकर 15 हजार रुपये प्रति माह करने का आदेश दिया था।

यह आदेश 20 जनवरी 2020 से प्रभावी होना था। इसके बाद कर्मचारियों को उम्मीद थी कि उनके बैंक खातों में पूरी 15 हजार रुपये की राशि पहुंचनी शुरू हो जाएगी। हालांकि, कंपनी ने इस राशि की अलग व्याख्या करते हुए इसे कॉस्ट टू कंपनी मान लिया और वैधानिक मदों को भी इसी रकम में समायोजित कर दिया।

नतीजतन, कर्मचारियों को अदालत के आदेश के अनुरूप पूरी 15 हजार रुपये की इन-हैंड सैलरी नहीं मिल पाई।

कर्मचारियों ने निष्पादन याचिका के जरिए मांगा आदेश का पालन

कंपनी की ओर से की गई इस व्याख्या के खिलाफ कर्मचारियों ने निष्पादन याचिका दायर की। इसमें अदालत से अपने पहले के आदेश को लागू करवाने की मांग की गई थी।

कर्मचारियों की ओर से दलील दी गई कि अदालत ने जब टेक होम वेतन 15 हजार रुपये निर्धारित किया था तो इसका अर्थ वही राशि है जो कर्मचारी को वास्तविक रूप से प्राप्त होनी है। कंपनी पीएफ, ईएसआई और अन्य वैधानिक देनदारियों को इसी रकम में शामिल कर कर्मचारियों को कम भुगतान नहीं कर सकती।

हाईकोर्ट ने कर्मचारियों की इस दलील को स्वीकार करते हुए कंपनी की व्याख्या को गलत ठहराया। अदालत के फैसले के बाद अब कंपनी को पूर्व आदेश के अनुरूप बकाया वेतन का भुगतान करना होगा।

20 जनवरी 2020 से 30 जनवरी 2021 तक के बकाये का भुगतान

हाईकोर्ट ने कंपनी को निर्देश दिया है कि प्रत्येक पात्र कर्मचारी को 20 जनवरी 2020 से 30 जनवरी 2021 तक 15 हजार रुपये प्रति माह की पूरी टेक होम सैलरी का भुगतान सुनिश्चित किया जाए। यह अवधि सक्षम प्राधिकारी द्वारा विवाद का निपटारा किए जाने की तिथि तक लागू होगी।

अदालत ने बकाया राशि का भुगतान करने के लिए कंपनी को दो महीने का समय दिया है। यानी कर्मचारियों को अब अदालत के आदेश के अनुसार बकाया वेतन मिलने का रास्ता साफ हो गया है।

यह आदेश उन कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्हें संबंधित अवधि में 15 हजार रुपये की तय टेक होम सैलरी के बजाय कम राशि प्राप्त हुई थी।

सैकड़ों एंबुलेंस कर्मियों को मिलेगा फैसले का लाभ

हाईकोर्ट के फैसले से प्रदेश के सैकड़ों एंबुलेंस चालकों और तकनीकी स्टाफ को राहत मिलने की बात कही जा रही है। 108 और 102 एंबुलेंस सेवाओं से जुड़े पायलट और ईएमटी लंबे समय से अपने पूर्ण मानदेय को लेकर संघर्ष कर रहे थे।

एंबुलेंस सेवा में पायलट और ईएमटी स्वास्थ्य आपात स्थिति में मरीजों को अस्पताल पहुंचाने से लेकर रास्ते में जरूरी सहायता उपलब्ध कराने तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में उनके वेतन से जुड़ा यह विवाद लंबे समय से कर्मचारियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ था।

अब हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के बाद कर्मचारियों को उम्मीद है कि बकाया राशि का भुगतान निर्धारित समय के भीतर किया जाएगा और भविष्य में भी टेक होम सैलरी की व्याख्या को लेकर इस तरह का विवाद नहीं रहेगा।

पीएफ और ईएसआई की जिम्मेदारी कंपनी की, कर्मचारी की इन-हैंड सैलरी नहीं घटेगी

इस फैसले का सबसे अहम पहलू अदालत की वह टिप्पणी है, जिसमें पीएफ और ईएसआई को कर्मचारी की 15 हजार रुपये की इन-हैंड सैलरी में शामिल करने से इनकार किया गया है।

अदालत के अनुसार, वैधानिक कटौतियां और कंपनी की वैधानिक जिम्मेदारियां कर्मचारी को मिलने वाली वास्तविक टेक होम राशि को कम करने का आधार नहीं बन सकतीं। इसका मतलब है कि तय टेक होम वेतन कर्मचारी के खाते में पहुंचना चाहिए, जबकि पीएफ और ईएसआई जैसे वैधानिक भुगतान को कंपनी को अपनी जिम्मेदारी के अनुसार देखना होगा।

इस फैसले से न केवल मौजूदा विवाद का समाधान होने की उम्मीद है, बल्कि टेक होम सैलरी और कॉस्ट टू कंपनी के बीच अंतर भी स्पष्ट होता है।

लंबे संघर्ष के बाद कर्मचारियों को मिली बड़ी राहत

108 और 102 एंबुलेंस सेवा के कर्मचारियों के लिए यह फैसला लंबे संघर्ष के बाद आया है। कर्मचारियों ने अदालत में यह मुद्दा उठाया कि उन्हें आदेश के मुताबिक पूरी 15 हजार रुपये की इन-हैंड सैलरी नहीं मिल रही है।

अब हाईकोर्ट ने उनकी मांग को स्वीकार करते हुए कंपनी को बकाया राशि का भुगतान करने के निर्देश दिए हैं। दो महीने की समय सीमा तय किए जाने के बाद कर्मचारियों को अपने बकाये का इंतजार है।

कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला 108 और 102 एंबुलेंस सेवा के पायलटों और ईएमटी के लिए बड़ी राहत है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 15 हजार रुपये की टेक होम सैलरी का अर्थ कर्मचारी के हाथ में आने वाली वास्तविक राशि है, न कि पीएफ, ईएसआई और अन्य वैधानिक मदों को मिलाकर बनाई गई कॉस्ट टू कंपनी। अब जीवीके कंपनी को अदालत के निर्देश के अनुसार पात्र कर्मचारियों के बकाये का भुगतान करना होगा।