➤ हमीरपुर के सर्वेश शर्मा के डिफेंस ड्रोन प्रोजेक्ट को 3.50 करोड़ की मंजूरी
➤ आईआईटी रुड़की में बनेगा इनक्यूबेशन सेंटर, 20 महीने में प्रोजेक्ट पूरा करने का लक्ष्य
➤ दिहाड़ी मजदूर के बेटे सर्वेश ने राष्ट्रीय ड्रोन प्रतियोगिता से शुरू किया सेना के लिए सफर
हमीरपुर। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के एक साधारण परिवार से आने वाले पॉलीटेक्निक छात्र सर्वेश शर्मा ने अपनी तकनीकी प्रतिभा और नवाचार के दम पर बड़ी उपलब्धि हासिल की है। बहुतकनीकी संस्थान बडू में कंप्यूटर इंजीनियरिंग के पांचवें सेमेस्टर में पढ़ रहे सर्वेश ने भारतीय थल सेना की सीमा निगरानी से जुड़ी जरूरत को ध्यान में रखते हुए एक अत्याधुनिक ड्रोन प्रोजेक्ट पर काम किया है। उनके इस प्रोजेक्ट के लिए रक्षा मंत्रालय से जुड़ी डिफेंस इनोवेशन ऑर्गेनाइजेशन (DIO) और इनोवेशन फॉर डिफेंस एक्सीलेंस (iDEX) के तहत 3.50 करोड़ रुपये की ग्रांट मंजूर की गई है। अब इस प्रोजेक्ट को आगे विकसित करने के लिए सर्वेश को आईआईटी रुड़की की लैब में काम करने का अवसर मिलेगा।
छोटे गांव से निकला बड़ा इनोवेशन
सर्वेश शर्मा बाहनवीं गांव के रहने वाले हैं और बेहद साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हैं। उनके पिता संजीव शर्मा दिहाड़ी-मजदूरी करते हैं। सर्वेश ने अपनी शुरुआती और माध्यमिक शिक्षा भी गांव के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला बाहनवीं से ही पूरी की है। इसके बाद उन्होंने बहुतकनीकी संस्थान बडू में कंप्यूटर इंजीनियरिंग में दाखिला लिया।
सीमित संसाधनों के बावजूद तकनीक और इनोवेशन में उनकी रुचि लगातार बढ़ती रही। पढ़ाई के दौरान उन्होंने ड्रोन तकनीक से जुड़े प्रयोग शुरू किए और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। इसी दौरान उनके सामने भारतीय सेना की बॉर्डर सर्विलांस से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा हुई, जिसने उन्हें इस दिशा में गंभीरता से काम करने के लिए प्रेरित किया।
राष्ट्रीय प्रतियोगिता से मिली प्रेरणा
सर्वेश ने आईआईटी जोधपुर और कोनार्क कोर की ओर से आयोजित राष्ट्रीय स्तर की ओपन कार्ड बोर्ड ड्रोन प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था। इस प्रतियोगिता में देश के प्रतिष्ठित संस्थानों की करीब 50 टीमों ने भाग लिया और अलग-अलग इनोवेटिव आइडिया प्रस्तुत किए।
इस प्रतियोगिता में सर्वेश की टीम ने 10 लाख रुपये का चौथा पुरस्कार हासिल किया। प्रतियोगिता के दौरान भारतीय सेना की सीमा निगरानी से जुड़ी जरूरतों पर चर्चा हुई। इसी अनुभव ने सर्वेश को सेना के लिए उपयोगी ड्रोन तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
इसके बाद उन्होंने अपने स्तर पर इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक शुरुआती प्रोटोटाइप तैयार करने में करीब 87 हजार रुपये खर्च हुए। इसके बाद सर्वेश ने रक्षा क्षेत्र के स्टार्टअप और इनोवेशन से संबंधित DIO-iDEX प्रोजेक्ट के तहत आवेदन किया।
रक्षा मंत्रालय से मिली 3.50 करोड़ की ग्रांट
सर्वेश के प्रोजेक्ट को अब रक्षा मंत्रालय की संबंधित प्रक्रिया के तहत 3.50 करोड़ रुपये की ग्रांट मंजूर हुई है। रक्षा मंत्रालय के डिफेंस प्रोडक्शन विभाग के अतिरिक्त सचिव एवं CEO दिनेश माहौर ने सोमवार को बजट स्वीकृत किए जाने की जानकारी दी है।
यह मंजूरी सर्वेश के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब उनका शुरुआती स्तर पर तैयार किया गया प्रोजेक्ट संस्थागत और तकनीकी स्तर पर आगे बढ़ सकेगा। ग्रांट मिलने के बाद ड्रोन की तकनीक को अधिक विकसित करने, परीक्षण करने और रक्षा जरूरतों के अनुरूप तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
आईआईटी रुड़की में होगा प्रोजेक्ट का इनक्यूबेशन
पॉलीटेक्निक संस्थान के प्रधानाचार्य चंद्रशेखर के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने प्रोजेक्ट से संबंधित औपचारिकताएं पूरी करने के लिए करीब 20 दिन का समय दिया है। प्रोजेक्ट के लिए इनक्यूबेशन सेंटर आईआईटी रुड़की में बनाया गया है।
अब सर्वेश आईआईटी रुड़की की लैब में विशेषज्ञों और उपलब्ध तकनीकी संसाधनों के साथ इस प्रोजेक्ट पर काम करेंगे। प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए 20 महीने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस दौरान ड्रोन के डिजाइन, तकनीकी क्षमता, परीक्षण और रक्षा क्षेत्र में संभावित उपयोग से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर काम किया जाएगा।
‘रुद्रा एज टी-1 स्पेक्ट्रा’ ड्रोन पर होगा काम
सर्वेश अब भारतीय सेना के लिए रुद्रा एज टी-1 (स्पेक्ट्रा) नाम के ड्रोन प्रोजेक्ट पर काम करेंगे। इसका उद्देश्य सीमा क्षेत्रों में निगरानी क्षमता को बेहतर बनाने में मदद करना है।
प्रोजेक्ट से जुड़े दावों के अनुसार, ड्रोन को इस तरह विकसित करने की कोशिश की जा रही है कि वह दुश्मन की निगरानी प्रणालियों से बच सके और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग जैसी चुनौतियों के बीच भी अपना काम कर सके। इन क्षमताओं की वास्तविक उपयोगिता और प्रदर्शन आगे होने वाले तकनीकी परीक्षणों के बाद ही स्पष्ट होगा।
यह प्रोजेक्ट रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक और युवा इनोवेटर्स की भागीदारी को भी दर्शाता है। हालांकि अभी इसे विकसित और परीक्षण किया जाना बाकी है, लेकिन एक पॉलीटेक्निक छात्र का शुरुआती स्तर पर तैयार प्रोटोटाइप से रक्षा मंत्रालय की ग्रांट तक पहुंचना अपने आप में महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
परिवार और संस्थान में खुशी का माहौल
सर्वेश की इस उपलब्धि से उनके परिवार और शिक्षकों में खुशी है। उनके माता-पिता ने बेटे की उपलब्धि पर गर्व जताया है। वहीं पॉलीटेक्निक कॉलेज के प्रधानाचार्य चंद्रशेखर, कंप्यूटर इंजीनियरिंग विभागाध्यक्ष समीर भारती और अन्य शिक्षकों ने सर्वेश को बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है।
सर्वेश की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने सरकारी स्कूल से पढ़ाई शुरू की, साधारण पारिवारिक परिस्थितियों के बीच तकनीकी शिक्षा हासिल की और फिर अपने इनोवेशन को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता से होते हुए रक्षा क्षेत्र के प्रोजेक्ट तक पहुंचाया।
अब आने वाले 20 महीने सर्वेश के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे। आईआईटी रुड़की की लैब में विशेषज्ञों के साथ काम करते हुए उनका प्रोजेक्ट किस तरह विकसित होता है और परीक्षणों के बाद इसे रक्षा जरूरतों के लिए किस स्तर तक उपयोगी बनाया जा सकता है, इस पर आगे की प्रगति निर्भर करेगी।



