➤ 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि शुरू, पहले दिन होगी मां शैलपुत्री की पूजा
➤ घटस्थापना का मुहूर्त सुबह 6:31 से 10:27 बजे तक, अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:01 से 12:49 बजे तक
➤ मां शैलपुत्री को सफेद फूल, देसी घी, खीर और मखाने की खीर अर्पित करने की परंपरा
➤ विस्तृत खबर
शारदीय नवरात्रि का आरंभ 11 अक्टूबर 2026, रविवार से हो रहा है। नौ दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक पर्व में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाएगी। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना के साथ घटस्थापना और जौ बोने की परंपरा निभाई जाती है। श्रद्धालु घरों और मंदिरों में पूजा की तैयारियां करते हैं तथा परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशहाली के लिए माता रानी से प्रार्थना करते हैं। इस बार शारदीय नवरात्रि 19 अक्टूबर तक चलेंगे, जबकि 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी।
घटस्थापना के लिए ये हैं शुभ मुहूर्त
नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कलश स्थापना के साथ नवरात्रि की पूजा का विधिवत आरंभ होता है। उपलब्ध पंचांग संबंधी जानकारी के अनुसार, 11 अक्टूबर को घटस्थापना का सामान्य मुहूर्त सुबह 6:31 बजे से 10:27 बजे तक बताया गया है। वहीं, अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:01 बजे से 12:49 बजे तक रहेगा। पूजा करने से पहले अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि कर लेना उचित रहेगा।
घटस्थापना के लिए उत्तर-पूर्व दिशा यानी ईशान कोण को शुभ माना जाता है। पूजा स्थल को साफ करके वहां चौकी स्थापित की जाती है। इसके बाद मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं और विधि-विधान से कलश स्थापित किया जाता है। कलश पर आम के पत्ते और नारियल रखने की परंपरा भी प्रचलित है।
घटस्थापना के लिए पूजा सामग्री
नवरात्रि के पहले दिन की पूजा के लिए कलश, मिट्टी का पात्र, जौ, अक्षत, कलावा, घी का दीपक, जौ बोने के लिए मिट्टी, आम के पत्ते, चुनरी सहित नारियल, रोली या सिंदूर और कपूर जैसी सामग्री रखी जा सकती है। श्रद्धालु अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार फूल, फल, मिठाई तथा अन्य पूजन सामग्री भी शामिल कर सकते हैं।
मां शैलपुत्री कौन हैं, जानें धार्मिक मान्यता
मां शैलपुत्री को मां दुर्गा के नौ स्वरूपों में पहला स्वरूप माना जाता है। धार्मिक कथा के अनुसार, देवी सती ने अपने पूर्व जन्म में देह त्यागने के बाद पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। संस्कृत में ‘शैल’ का अर्थ पर्वत होता है। इसी कारण हिमालय की पुत्री होने के नाते देवी को शैलपुत्री कहा गया।
मां शैलपुत्री का स्वरूप श्रद्धा, शक्ति और प्रकृति से जुड़ा माना जाता है। उन्हें वृषभ यानी बैल पर सवार दिखाया जाता है। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल रहता है। नवरात्रि के पहले दिन भक्त माता के इसी स्वरूप की पूजा कर नौ दिवसीय साधना की शुरुआत करते हैं।
मां शैलपुत्री की पूजा का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना करने से जीवन में सुख-समृद्धि, सौभाग्य और आरोग्य की कामना की जाती है। जिन परिवारों में विवाह संबंधी बाधाओं या जीवन की परेशानियों को लेकर चिंता रहती है, वे भी श्रद्धापूर्वक माता की पूजा करते हैं। हालांकि, ये धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं से जुड़ी मान्यताएं हैं।
नवरात्रि के दौरान दुर्गा सप्तशती का पाठ भी विशेष महत्व रखता है। श्रद्धालु इसे मानसिक शांति, आत्मबल और सकारात्मकता की कामना के साथ पढ़ते हैं। पाठ करते समय स्वच्छता, एकाग्रता और श्रद्धा बनाए रखने पर जोर दिया जाता है।
मां शैलपुत्री की पूजा कैसे करें
सबसे पहले पूजा स्थल और घर की सफाई करें। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा की तैयारी करें। इसके बाद शुभ मुहूर्त में घटस्थापना करें और मां शैलपुत्री का ध्यान करते हुए दीपक जलाएं। माता को फूल, अक्षत, रोली, फल और अपनी श्रद्धा के अनुसार भोग अर्पित करें।
पूजा के दौरान मां शैलपुत्री के मंत्र का जप किया जा सकता है। इसके बाद माता की कथा, स्तुति या आरती करें। अंत में परिवार की सुख-शांति और सभी के कल्याण की प्रार्थना करें। पूजा की विधि परिवार की परंपरा और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
मां शैलपुत्री का मंत्र
मां शैलपुत्री की आराधना के लिए यह मंत्र प्रचलित है:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नमः।
श्रद्धालु अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार मंत्र का जप कर सकते हैं। जप के दौरान मन को शांत रखकर माता का ध्यान करना पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
मां शैलपुत्री को कौन-सा फूल चढ़ाएं
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री को सफेद फूल अर्पित करने की परंपरा बताई जाती है। कुछ धार्मिक मान्यताओं में चमेली के फूल को भी माता का प्रिय फूल माना गया है। श्रद्धालु अपनी उपलब्धता के अनुसार ताजे और स्वच्छ फूल चढ़ा सकते हैं। माता को सफेद वस्त्र अर्पित करने की परंपरा भी प्रचलित है।
मां शैलपुत्री को क्या भोग लगाएं
पहले दिन माता को सफेद रंग की मिठाइयां और दूध से बनी चीजें अर्पित करना शुभ माना जाता है। श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार देसी घी, गाय के दूध से बनी खीर, मलाई, मावे की मिठाई या मखाने की खीर का भोग लगा सकते हैं। भोग लगाने के बाद उसे प्रसाद के रूप में परिवार और अन्य श्रद्धालुओं में बांटा जा सकता है।
मां शैलपुत्री की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु मां शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
इस स्तुति के माध्यम से भक्त मां दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप को नमन करते हैं।
दुर्गा सप्तशती के पाठ में इन बातों का रखें ध्यान
नवरात्रि के दौरान दुर्गा सप्तशती का पाठ करने वाले श्रद्धालु कुछ पारंपरिक नियमों का पालन करते हैं। पाठ शुरू करने से पहले मां दुर्गा का ध्यान और प्रणाम किया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, पुस्तक को स्वच्छ चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर रखा जा सकता है। पाठ के दौरान लाल या कुश के आसन पर बैठने की मान्यता भी प्रचलित है।
पाठ करते समय श्लोकों का स्पष्ट उच्चारण करने और मन को एकाग्र रखने पर ध्यान देना चाहिए। यदि बीच में विराम लेना पड़े, तो परंपरा के अनुसार अध्याय पूरा करने के बाद रुकना उचित माना जाता है। पाठ समाप्त होने पर माता से क्षमा-प्रार्थना कर पूजा समर्पित की जाती है।
मां शैलपुत्री की आरती
शैलपुत्री मां बैल असवार, करें देवता जय-जयकार।
शिव-शंकर की प्रिय भवानी, तेरी महिमा किसी ने न जानी।
पार्वती तू उमा कहलावे, जो तुझे सुमिरे सो सुख पावे।
रिद्धि-सिद्धि प्रदान करे तू, दया करे, धनवान करे तू।
सोमवार को शिव संग प्यारी, आरती जिसने तेरी उतारी।
उसकी सगरी आस पुजा दो, सगरे दुख-तकलीफ मिटा दो।
घी का सुंदर दीप जला के, गोला-गरी का भोग लगा के।
श्रद्धा भाव से मंत्र जपाएं, प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।
जय गिरराज किशोरी अंबे, शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।
मनोकामना पूर्ण कर दो, चमन सदा सुख-संपत्ति भर दो।
नवरात्रि में मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान की मान्यता
धार्मिक मान्यताओं में नवरात्रि के आरंभ और समापन के दिन के आधार पर मां दुर्गा की आगमन और प्रस्थान सवारी का उल्लेख मिलता है। दी गई जानकारी के अनुसार, रविवार या सोमवार से नवरात्रि शुरू होने पर देवी के हाथी पर आगमन की मान्यता बताई गई है। वहीं, मंगलवार को नवरात्रि का समापन होने पर मुर्गे को प्रस्थान सवारी से जोड़ा गया है। इन मान्यताओं को धार्मिक परंपरा के रूप में देखा जाता है; इन्हें भविष्य की घटनाओं का प्रमाणित पूर्वानुमान नहीं माना जाना चाहिए।
नवरात्रि का पर्व श्रद्धा, संयम और भक्ति का अवसर है। पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा के साथ श्रद्धालु नौ दिनों की साधना शुरू करते हैं। घर में स्वच्छता बनाए रखना, जरूरतमंदों की सहायता करना और परिवार के साथ सकारात्मक वातावरण में पूजा करना भी इस पर्व की भावना से जुड़ा है।



