➤ BBMB विवाद में केंद्र का कैशलेस सेटलमेंट प्रस्ताव, नकद की जगह बिजली के रूप में मिलेगा बकाया
➤ हिमाचल और हरियाणा प्रस्ताव से सहमत, सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब को दो सप्ताह में जवाब देने के निर्देश दिए
➤ 13,066 मिलियन यूनिट बकाया और 420 करोड़ रुपये के भुगतान से भी मिल सकती है राहत
नई दिल्ली/शिमला। भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) परियोजनाओं में हिमाचल प्रदेश के हिस्से को लेकर करीब छह दशक से चले आ रहे विवाद में प्रदेश को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जगी है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कैशलेस सेटलमेंट का प्रस्ताव रखा, जिसके तहत हिमाचल प्रदेश को उसके लंबित बकाये का भुगतान नकद की बजाय बिजली (ऊर्जा) के रूप में किया जाएगा।
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि हिमाचल प्रदेश और हरियाणा सरकारें इस प्रस्ताव से सिद्धांततः सहमत हैं, जबकि पंजाब सरकार ने इस पर आपत्ति जताई है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब से दो सप्ताह के भीतर अपना स्पष्ट जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 12 अगस्त को होगी।
सुप्रीम कोर्ट के 27 सितंबर 2011 के फैसले के बाद हिमाचल प्रदेश को BBMB परियोजनाओं से 7.19 प्रतिशत बिजली का हिस्सा मिलना शुरू हुआ था, लेकिन 1966 से 2011 तक की अवधि का बकाया अब भी लंबित है। यह बकाया लगभग 13,066 मिलियन यूनिट बिजली के बराबर बताया गया है।
केंद्र सरकार ने सुझाव दिया है कि पंजाब और हरियाणा यह बकाया नकद देने के बजाय बिजली के रूप में चुकाएं। प्रस्ताव के अनुसार 13,066 मिलियन यूनिट में से 12,000 मिलियन यूनिट से अधिक बिजली हिमाचल प्रदेश को उपलब्ध कराई जा सकती है।
420 करोड़ रुपये का बोझ भी होगा खत्म
प्रस्ताव का एक अहम पहलू यह भी है कि हिमाचल प्रदेश को BBMB परियोजनाओं की पूंजीगत लागत के रूप में पंजाब और हरियाणा को करीब 420 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं करना होगा। इस राशि को भी बिजली के बकाये में समायोजित करने का प्रस्ताव है, जिससे प्रदेश को अतिरिक्त वित्तीय राहत मिल सकती है।
दरों पर पंजाब की आपत्ति
पंजाब सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता निधेश गुप्ता ने अदालत में कहा कि बकाये की गणना के लिए प्रस्तावित 2.50 रुपये प्रति यूनिट की दर अधिक है। उनका तर्क है कि यदि यही दर लागू हुई तो पंजाब पर करीब 2,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा। इसी आधार पर राज्य सरकार ने प्रस्ताव पर आपत्ति दर्ज कराई है।



