➤ धामी में दिवाली के दूसरे दिन पत्थरों का खेल आयोजित हुआ
➤ जमोगी और कटेड़ू टोलियों के बीच करीब 40 मिनट तक पत्थरों की बरसात हुई
➤ खून से मां भद्रकाली को तिलक कर पूरी हुई सदियों पुरानी देव परंपरा
राजधानी शिमला से करीब 35 किलोमीटर दूर धामी में दिवाली के दूसरे दिन सदियों पुरानी पत्थर के खेल की परंपरा को एक बार फिर निभाया गया। यह परंपरा देव संस्कृति और मां भद्रकाली की पूजा से जुड़ी है, जिसमें दो टोलियों — जमोगी और कटेड़ू — के लोग एक-दूसरे पर पत्थर बरसाकर परंपरा निभाते हैं।
मंगलवार को खेल का चौरा मैदान में करीब शाम चार बजे पत्थरों का यह खेल शुरू हुआ, जो लगभग पौना घंटा यानी 40 मिनट तक चला। दोनों टोलियों ने घाटी के दोनों ओर से पत्थरों की झड़ी लगा दी। इस दौरान कटेड़ू टोली के सुभाष के हाथ में पत्थर लगा, जिसके बाद उनके खून से मां भद्रकाली के मंदिर में तिलक कर परंपरा पूरी की गई।
इस दौरान मैदान में सैकड़ों की संख्या में लोग मौजूद रहे और ढोल-नगाड़ों की थाप पर झूमते हुए इस अनोखे खेल का आनंद लेते रहे। राज परिवार के उत्तराधिकारी जगदीप सिंह ने दरबार से पूजा अर्चना कर मां भद्रकाली के मंदिर में तिलक किया और लोगों की सुख-समृद्धि की कामना की।
खेल का चौरा मैदान में पत्थर लगने के बाद आयोजकों ने खेल रोकने का संकेत दिया। सुभाष को प्राथमिक उपचार दिया गया। यह परंपरा सदियों पुरानी है और माना जाता है कि राज परिवार की राज माता ने कभी मानव बलि के विकल्प के रूप में इस खेल की शुरुआत की थी, ताकि किसी की जान न जाए और क्षेत्र में संकट न आए। तब से यह परंपरा निरंतर निभाई जा रही है।
जमोगी टोली में जनिया, प्लानिया, कोठी, चईंयां, ओखरू जैसे गांवों के लोग शामिल होते हैं, जबकि कटेड़ू टोली में तुनड़ू, धगोई, बठमाणा और आसपास के गांवों के लोग भाग लेते हैं। कोरोना काल में जब परंपरा टूटने का डर था, तब जगदीप सिंह ने अपने खून से भद्रकाली मंदिर में तिलक कर यह परंपरा जारी रखी थी।



