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हमीरपुर की ताल कृषि सहकारी सभा में 2.46 करोड़ की गड़बड़ी, विजिलेंस ने छह पर दर्ज किया केस

ताल कृषि सहकारी सभा में 2.46 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय गड़बड़ी का खुलासा
जाली एफडीआर और फर्जी हस्ताक्षरों के इस्तेमाल का आरोप, छह लोगों पर केस दर्ज
2011-12 से 2023-24 तक के रिकॉर्ड की जांच में सोसायटी और बैंक अभिलेखों में बड़ा अंतर मिला


हमीरपुर की ताल कृषि सहकारी सभा में एफडीआर और जमा राशि से जुड़े रिकॉर्ड की जांच के दौरान सामने आई कथित वित्तीय गड़बड़ी ने सहकारी व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (विजिलेंस) ने मामले में छह लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। जांच में सोसायटी के रिकॉर्ड और संबंधित बैंकों के वास्तविक अभिलेखों के बीच लाखों नहीं, बल्कि 2.46 करोड़ रुपये से अधिक का अंतर सामने आया है।

विजिलेंस के अनुसार, जांच के दौरान ऐसे दस्तावेज भी सामने आए जिनके बारे में आरोप है कि जाली एफडीआर और अन्य कागजात तैयार किए गए तथा उन पर फर्जी हस्ताक्षर किए गए। इन दस्तावेजों को वास्तविक रिकॉर्ड के तौर पर इस्तेमाल किए जाने का भी आरोप है। मामले की जांच वर्ष 2011-12 से 2023-24 तक सोसायटी में जमा राशि और एफडीआर से संबंधित रिकॉर्ड पर केंद्रित रही।

सोसायटी के रिकॉर्ड और बैंक अभिलेखों में बड़ा अंतर

जांच का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वर्ष 2023-24 के एफडीआर रिकॉर्ड से सामने आया। सोसायटी के अभिलेखों में इस अवधि में कुल 5,17,62,690 रुपये की एफडीआर दर्ज दिखाई गई। जब इन एफडीआर का संबंधित बैंकों के वास्तविक रिकॉर्ड से मिलान किया गया तो केवल 2,71,07,020 रुपये की एफडीआर ही बैंक रिकॉर्ड में सत्यापित हो सकी।

इस तरह दोनों रिकॉर्ड के बीच 2,46,55,670 रुपये का अंतर पाया गया। जांच रिपोर्ट में इस अंतर को कथित गबन या धन के दुरुपयोग से जोड़कर देखा गया है। इतनी बड़ी रकम का रिकॉर्ड में दर्ज होना और बैंक अभिलेखों में उसका मिलान नहीं होना जांच एजेंसी के लिए मामले का अहम आधार बना।

छह लोगों को बनाया गया आरोपी

विजिलेंस ने मामले में अजय पाल, अशोक शर्मा, यौवनलता, सुनील कुमार, रमेश शर्मा और सुरेश परमार को आरोपी बनाया है। आरोपियों में सोसायटी के तत्कालीन सचिव के अलावा सहकारिता विभाग और अंकेक्षण व्यवस्था से जुड़े अधिकारी भी शामिल बताए गए हैं।

जांच एजेंसी का आरोप है कि संबंधित अंकेक्षण अधिकारियों ने सोसायटी के अभिलेखों का बैंक रिकॉर्ड के साथ आवश्यक भौतिक सत्यापन नहीं किया। इसके बजाय कथित तौर पर जाली दस्तावेजों के आधार पर अंकेक्षण रिपोर्ट तैयार की गई। यही वजह है कि जांच में केवल एफडीआर के रिकॉर्ड को ही नहीं, बल्कि सोसायटी की पूरी ऑडिट और रिकॉर्ड सत्यापन व्यवस्था को भी जांच के दायरे में रखा गया।

फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल का भी आरोप

मामले में सिर्फ रकम के रिकॉर्ड में अंतर का आरोप नहीं है। विजिलेंस की जांच में कथित तौर पर ऐसे दस्तावेज सामने आए हैं जिनमें फर्जी हस्ताक्षर किए जाने और जाली एफडीआर तैयार करने की बात सामने आई है। आरोप है कि इन दस्तावेजों को वास्तविक बताकर सोसायटी के रिकॉर्ड में इस्तेमाल किया गया।

यदि जांच में ये आरोप प्रमाणित होते हैं तो मामला केवल वित्तीय रिकॉर्ड में लापरवाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसे गंभीर पहलुओं तक पहुंच सकता है। हालांकि, एफआईआर में लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगी।

इन धाराओं के तहत दर्ज हुआ मामला

विजिलेंस ने आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 406, 420, 467, 468, 471 और 120-बी के तहत मामला दर्ज किया है। इसके अलावा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(डी) के साथ धारा 13(2) भी लगाई गई है।

धाराओं के चयन से साफ है कि जांच एजेंसी ने मामले में कथित आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी, जालसाजी, जाली दस्तावेज को असली के तौर पर इस्तेमाल करने और आपराधिक साजिश जैसे पहलुओं को गंभीरता से लिया है।

12 साल से अधिक के रिकॉर्ड की पड़ताल

विजिलेंस की जांच का दायरा भी काफी लंबा रहा है। एजेंसी ने वर्ष 2011-12 से 2023-24 तक के रिकॉर्ड को खंगाला। इस दौरान सोसायटी में जमा राशि, एफडीआर और उनसे संबंधित दस्तावेजों का मिलान संबंधित बैंकों के अभिलेखों से किया गया।

सहकारी सभाओं में लोगों की जमा पूंजी और वित्तीय रिकॉर्ड की पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में किसी सोसायटी के रिकॉर्ड में करोड़ों रुपये की एफडीआर दर्ज होना, लेकिन बैंक अभिलेखों में उसका बड़ा हिस्सा नहीं मिलना अपने आप में गंभीर जांच का विषय बन जाता है। ताल कृषि सहकारी सभा से जुड़े इस मामले में भी विजिलेंस ने रिकॉर्ड के इसी अंतर को केंद्र में रखकर जांच आगे बढ़ाई।

अब जांच में सामने आ सकते हैं और तथ्य

छह लोगों के खिलाफ केस दर्ज होने के बाद अब जांच एजेंसी की कार्रवाई आगे बढ़ेगी। जांच में यह पता लगाने की कोशिश होगी कि कथित तौर पर जाली एफडीआर और दस्तावेज किस तरह तैयार किए गए, उनका इस्तेमाल कैसे हुआ और रिकॉर्ड में इतनी बड़ी रकम का अंतर किन परिस्थितियों में पैदा हुआ।

इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि अंकेक्षण के दौरान बैंक रिकॉर्ड का सत्यापन क्यों नहीं हो पाया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका किस स्तर तक रही। जांच आगे बढ़ने के साथ वित्तीय रिकॉर्ड, बैंक दस्तावेज और अन्य संबंधित अभिलेखों से इस पूरे मामले की तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।

फिलहाल विजिलेंस ने मामले को दर्ज कर जांच की औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ा दी है। 2,46,55,670 रुपये के कथित अंतर ने हमीरपुर की इस कृषि सहकारी सभा के वित्तीय रिकॉर्ड पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अब जांच और न्यायिक प्रक्रिया यह तय करेगी कि इस गड़बड़ी के पीछे वास्तविक जिम्मेदारी किसकी थी और कथित तौर पर गायब रकम का वास्तविक हिसाब क्या है।