➤ आढ़तियों ने अडानी समेत निजी कंपनियों के बहिष्कार की अपील की
➤ मंडियों में पितू सेब 100 से 120 रुपये, निजी कंपनियों के शुरुआती रेट करीब 60 रुपये
➤ MLA कुलदीप राठौर बोले- मार्केटिंग बोर्ड मूकदर्शक न बने, बागवानों को उचित मूल्य दिलाए
हिमाचल प्रदेश में सेब सीजन के बीच आढ़तियों और निजी कंपनियों के बीच रेट को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। आढ़तियों ने अडानी समेत दूसरे कॉर्पोरेट घरानों पर सेब के रेट कम खोलकर खुले बाजार को प्रभावित करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि मंडियों में सेब के बेहतर दाम मिल रहे हैं, लेकिन निजी कंपनियां खासकर छोटे आकार के सेब के काफी कम रेट तय कर रही हैं। इससे बागवानों को सीधा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
आढ़तियों का आरोप है कि निजी कंपनियों की खरीद नीति के कारण ओपन मार्केट के रेट पर दबाव बन रहा है। उनका कहना है कि कंपनियां अच्छे और बड़े आकार के सेब को तो खरीद लेती हैं, लेकिन छोटे आकार या दूसरे ग्रेड के सेब को कम कीमत पर खरीदने या मंडियों की ओर भेजने की स्थिति पैदा हो जाती है। इससे पूरे बाजार के भाव प्रभावित होते हैं।
मामला अब राजनीतिक स्तर पर भी पहुंच गया है। ठियोग के विधायक और कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता कुलदीप राठौर ने छोटे आकार के सेब के कम दाम को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि हिमाचल के बागवान पहले ही मौसम की मार, बढ़ती उत्पादन लागत और कम उत्पादन जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसे समय में उनकी मजबूरी का फायदा उठाना किसी भी स्थिति में उचित नहीं है।
राठौर ने स्पष्ट कहा कि बागवानों के हितों के साथ खिलवाड़ नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने हिमाचल प्रदेश मार्केटिंग बोर्ड की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि बोर्ड सिर्फ मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकता। उसे सेब की खरीद और विपणन व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, ताकि बागवानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल सके।
मंडियों में 100 से 120 रुपये, कंपनियां करीब 60 रुपये में खरीद रहीं पितू सेब
हिमाचल आढ़त एसोसिएशन के चेयरमैन हरीश ठाकुर ने निजी कंपनियों और मंडियों के रेट में बड़े अंतर का दावा किया है। उनके मुताबिक पराला मंडी में इन दिनों सेब करीब 105 से 170 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। दूसरी ओर निजी कंपनियां अलग-अलग ग्रेड और आकार के अनुसार करीब 40 से 115 रुपये प्रति किलो तक के भाव पर खरीद कर रही हैं।
हरीश ठाकुर के अनुसार, सबसे छोटे आकार के सेब यानी ‘पितू’ सेब का मंडियों में भाव करीब 100 से 120 रुपये प्रति किलो चल रहा है। इसके विपरीत निजी कंपनियों की ओर से पितू सेब का शुरुआती रेट करीब 60 रुपये प्रति किलो रखा गया है। आढ़तियों का कहना है कि इसी तरह के अंतर से बागवानों को अपनी उपज बेचने में नुकसान हो रहा है।
आढ़तियों का आरोप- निजी कंपनियों के रेट खुलते ही गिर जाता है बाजार
हिमाचल आढ़त एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष प्रताप चौहान ने निजी कंपनियों की खरीद व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि हर साल जब निजी कंपनियां अपने खरीद रेट खोलती हैं, तो उसके बाद ओपन मार्केट पर दबाव देखने को मिलता है।
उनका कहना है कि इसकी एक बड़ी वजह यह है कि निजी कंपनियां मुख्य रूप से ‘ए’ ग्रेड सेब खरीद लेती हैं। इसके बाद बाकी सेब को रिजेक्ट कर मंडियों की ओर भेज दिया जाता है। इससे मंडियों में एक साथ अधिक मात्रा में सेब पहुंचता है और मांग तथा आपूर्ति का संतुलन बिगड़ने से बाजार भाव नीचे आने लगते हैं।
प्रताप चौहान ने सरकार से मांग की है कि जिस तरह आढ़तियों को गड्ड यानी सभी आकार के सेब को एक औसत रेट पर खरीदने की व्यवस्था में काम करना पड़ता है, उसी तरह निजी कंपनियों को भी इस व्यवस्था के तहत सेब खरीदने के लिए बाध्य किया जाए।
गड्ड व्यवस्था में बागवानों को मिलता है पूरे लॉट का औसत मूल्य
आढ़तियों के मुताबिक मंडियों में बागवानों के सेब को अलग-अलग आकार के आधार पर पूरी तरह अलग-अलग कीमत पर नहीं बेचा जाता। गड्ड व्यवस्था में पूरे लॉट के सेब का औसत रेट तय होता है। इससे बागवान को उसके पूरे माल का एक बेहतर औसत मूल्य मिल जाता है।
इसके विपरीत निजी कंपनियां सेब की क्वालिटी, आकार और ग्रेड के आधार पर अलग-अलग रेट तय करती हैं। आढ़तियों का कहना है कि इससे छोटे आकार के सेब के दाम काफी नीचे चले जाते हैं और बागवानों को अपनी पूरी उपज का अपेक्षित मूल्य नहीं मिल पाता।
आढ़तियों का यह भी कहना है कि निजी कंपनियों की अलग-अलग ग्रेड में खरीद का असर सिर्फ एक बागवान या एक मंडी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव पूरे सेब बाजार के भाव पर पड़ता है।
निजी कंपनियों के खिलाफ लामबंद हुए आढ़ती
इस मुद्दे को लेकर हिमाचल आढ़त एसोसिएशन ने बैठक भी की है। बैठक में आढ़तियों ने निजी कंपनियों की कथित मनमानी को रोकने के लिए सरकार से हस्तक्षेप की मांग की। आढ़तियों ने कहा कि उनकी मांग केवल उनके कारोबार से जुड़ी नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध प्रदेश के हजारों सेब उत्पादकों के हितों से है।
आढ़तियों ने निजी कंपनियों के बहिष्कार की अपील करते हुए कहा कि यदि कंपनियां बाजार में अलग-अलग ग्रेड के नाम पर बेहद कम रेट तय करती हैं और इससे ओपन मार्केट प्रभावित होता है, तो इस व्यवस्था पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
उनका कहना है कि मजबूत और पारदर्शी सेब बाजार केवल इस साल के बागवानों के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि आने वाले वर्षों में हिमाचल की बागवानी अर्थव्यवस्था को बचाए रखने के लिए भी जरूरी है।
सेब हिमाचल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। हजारों परिवारों की आमदनी सीधे तौर पर बागवानी से जुड़ी है। ऐसे में सेब के भाव में मामूली बदलाव भी बागवानों की पूरी साल की आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि इस बार निजी कंपनियों के खरीद रेट और मंडियों के भाव में अंतर को लेकर बागवानों, आढ़तियों और राजनीतिक प्रतिनिधियों के बीच चिंता बढ़ गई है।
अब निगाहें सरकार और मार्केटिंग बोर्ड पर हैं कि वह इस विवाद के बीच क्या कदम उठाता है। बागवानों की सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि उनकी मेहनत और लागत को देखते हुए उन्हें ऐसा मूल्य मिले, जिससे सेब की खेती आर्थिक रूप से टिकाऊ बनी रहे।



