➤ नियमितीकरण के बाद पूरी अनुबंध सेवा सेवा लाभों के लिए मान्य होगी
➤ वरिष्ठता, वेतन वृद्धि, वेतन निर्धारण, पदोन्नति और पेंशन में मिलेगा लाभ
➤ सरकार को तीन महीने में बकाया वित्तीय लाभ देने का आदेश, देरी पर 6% ब्याज
शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अनुबंध आधार पर नियुक्त कर्मचारियों के हित में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के तहत विज्ञापन जारी कर, निर्धारित चयन प्रक्रिया पूरी करने के बाद और स्वीकृत पद पर की गई है, तो नियमितीकरण के बाद उसकी पूरी अनुबंध अवधि को सेवा लाभों से बाहर नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट के इस फैसले से उन कर्मचारियों को राहत मिल सकती है, जिनकी नियुक्ति नियमित पदों पर निर्धारित भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से हुई थी, लेकिन बाद में नियमितीकरण के समय उनकी अनुबंध अवधि को वरिष्ठता अथवा दूसरे सेवा लाभों में नहीं जोड़ा गया।
न्यायमूर्ति जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने कहा कि जब याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियां निर्धारित भर्ती प्रक्रिया के तहत हुई थीं, तो उनकी अनुबंध अवधि को सेवा लाभों से अलग रखने का कोई आधार नहीं है। अदालत ने माना कि नियुक्ति प्रक्रिया में विज्ञापन, लिखित परीक्षा और साक्षात्कार जैसी निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया गया था।
पूरी अनुबंध अवधि को मिलेगा सेवा लाभ
फैसले के अनुसार, नियमितीकरण से पहले की पूरी अनुबंध सेवा अवधि को संबंधित कर्मचारियों के सेवा लाभों के लिए गिना जाएगा। इसमें वरिष्ठता, सालाना वेतन वृद्धि, वेतन निर्धारण, पदोन्नति और पेंशन संबंधी लाभ शामिल हैं।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारियों को केवल इसलिए उनकी प्रारंभिक सेवा अवधि के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता कि उनकी नियुक्ति शुरुआत में अनुबंध आधार पर हुई थी। यदि नियुक्ति स्वीकृत पद पर निर्धारित भर्ती नियमों के अनुसार हुई है, तो अनुबंध सेवा को सेवा रिकॉर्ड का हिस्सा माना जाना चाहिए।
कर्मचारियों को प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से वित्तीय लाभ
हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि चूंकि याचिकाकर्ताओं ने समय रहते न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, इसलिए उन्हें प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से देय सभी वित्तीय लाभ दिए जाएं।
सरकार को अदालत के आदेश की प्रति प्राप्त होने के तीन महीने के भीतर कर्मचारियों के बकाया वित्तीय लाभ का भुगतान करने के निर्देश दिए गए हैं।
अदालत ने भुगतान में देरी की स्थिति में भी स्पष्ट आदेश दिया है। यदि निर्धारित अवधि में बकाया राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तो कर्मचारियों को बकाया रकम पर भुगतान की वास्तविक तारीख तक छह प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा।
2010 के विज्ञापन से शुरू हुआ मामला
यह मामला मनोज कुमार, अजय कुमार और भूपेंद्र पाल की ओर से दायर विभिन्न याचिकाओं की संयुक्त सुनवाई के दौरान सामने आया।
याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2010 में जारी विज्ञापन के आधार पर भाषा अध्यापक, टीजीटी (मेडिकल) और ड्रॉइंग मास्टर के पदों के लिए आवेदन किया था। इन पदों के लिए उन्होंने भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के तहत निर्धारित लिखित परीक्षा और साक्षात्कार की प्रक्रिया पूरी की और चयनित हुए।
इसके बावजूद सरकार ने उन्हें तत्काल नियमित नियुक्ति देने के बजाय वर्ष 2012 में 13,500 रुपये के निश्चित वेतन पर अनुबंध आधार पर नियुक्त किया।
बाद में इन कर्मचारियों की सेवाएं नियमित कर दी गईं। हालांकि, नियमितीकरण के बाद उनकी अनुबंध अवधि को वरिष्ठता और अन्य सेवा लाभों के लिए शामिल नहीं किया गया। कर्मचारियों ने इसी फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट के फैसले से कर्मचारियों को क्या फायदा होगा
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नियमितीकरण से पहले की अनुबंध सेवा को सेवा लाभों के लिए मान्यता मिलने से कर्मचारियों की सेवा अवधि दोबारा निर्धारित हो सकती है। इसका असर उनकी वरिष्ठता, वेतन वृद्धि, वेतन निर्धारण, पदोन्नति और पेंशन पर पड़ सकता है।
इसके अलावा, जिन वित्तीय लाभों से कर्मचारी अब तक वंचित रहे हैं, उनकी गणना प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से की जाएगी। सरकार को इन्हें निर्धारित समय सीमा में जारी करना होगा।
हाईकोर्ट का यह फैसला इस बात पर जोर देता है कि नियमित भर्ती प्रक्रिया के तहत स्वीकृत पदों पर नियुक्त कर्मचारियों की अनुबंध सेवा को केवल नियुक्ति के स्वरूप के आधार पर सेवा लाभों से अलग नहीं किया जा सकता।



