➤ कांगड़ा में 64 वर्षीय सेवानिवृत्त अफसर को एक माह तक डिजिटल अरेस्ट रख 33 लाख ठगे
➤ 6.8 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंसाने और गिरफ्तारी वारंट का डर दिखाया
➤ पुलिस-सीबीआई अधिकारी बनकर हर गतिविधि पर रखी नजर, 12 और 20 अगस्त
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में साइबर ठगी का हैरान करने वाला मामला सामने आया है। धीरा तहसील के 64 वर्षीय सेवानिवृत्त अधिकारी को साइबर ठगों ने करीब एक माह तक डिजिटल अरेस्ट रखा और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में फंसाने की धमकी देकर 33 लाख रुपये ठग लिए। शातिरों ने खुद को दूरसंचार कंपनी, पुलिस और सीबीआई के अधिकारी बताकर बुजुर्ग को लगातार डर और मानसिक दबाव में रखा।
ठगों ने पीड़ित को बताया कि उनके आधार कार्ड पर आईसीआईसीआई बैंक में एक खाता खोला गया है और इस खाते का इस्तेमाल 6.8 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में लेनदेन के लिए हुआ है। इसके बाद कथित पुलिस अधिकारी ने उनके नाम पर गिरफ्तारी वारंट जारी होने की बात कही। गिरफ्तारी से बचाने और मामला रफा-दफा करने के नाम पर ठगों ने उन्हें लगातार अपने जाल में उलझाए रखा।
करीब एक महीने तक चले इस पूरे घटनाक्रम में पीड़ित को घर से बाहर जाने से पहले और वापस लौटने पर अपनी हर गतिविधि की जानकारी देने के लिए मजबूर किया गया। ठगों ने वीडियो कॉल और फोन के जरिए निगरानी रखने का नाटक किया और आखिरकार बैंक खातों की जांच के बहाने उनकी 33 लाख रुपये की रकम अपने खातों में ट्रांसफर करवा ली।
30 जुलाई को आया था पहला फोन, आधार कार्ड से जुड़े खाते का डर दिखाया
साइबर क्राइम पुलिस थाना धर्मशाला में दर्ज शिकायत के अनुसार इस ठगी की शुरुआत 30 जुलाई को हुई। उस दिन सेवानिवृत्त अधिकारी को एक फोन आया। कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली की एक दूरसंचार कंपनी का अधिकारी बताते हुए कहा कि उनके आधार कार्ड पर आईसीआईसीआई बैंक में एक खाता खोला गया है।
ठग ने दावा किया कि इस बैंक खाते का इस्तेमाल करीब 6.8 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में लेनदेन के लिए किया गया है। अचानक इतने बड़े अपराध से नाम जोड़ दिए जाने से पीड़ित घबरा गए।
इसके बाद ठगों ने मामले को और गंभीर बनाने के लिए अलग-अलग अधिकारियों के रूप में उनसे संपर्क करना शुरू कर दिया। कभी पुलिस अधिकारी तो कभी सीबीआई अधिकारी बनकर उनसे बातचीत की गई।
खुद को IPS अधिकारी बताकर गिरफ्तारी वारंट की धमकी दी
ठगी के अगले चरण में एक अन्य व्यक्ति ने खुद को आईपीएस अधिकारी बताया। उसने सेवानिवृत्त अधिकारी से कहा कि उनके नाम पर गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका है। इसके साथ ही ठगों ने यह दावा भी किया कि मामले को रफा-दफा करने के लिए उसने 70 लाख रुपये कमीशन लिया है।
इस तरह की बातों से पीड़ित को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की गई कि मामला बेहद गंभीर है और किसी भी समय उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है। डर का माहौल पैदा करने के बाद साइबर ठगों ने उन्हें अपनी बातों के मुताबिक काम करने के लिए मजबूर कर दिया।
इसके बाद कथित सीबीआई अधिकारी ने भी इस फर्जी कार्रवाई को आगे बढ़ाया। उसने पीड़ित पर निगरानी रखने का नाटक किया और कहा कि उनकी सुरक्षा के लिए दो लोगों को तैनात किया गया है।
हर एक-दो घंटे में देनी पड़ती थी अपनी कुशलता की जानकारी
ठगों ने सेवानिवृत्त अधिकारी को केवल फोन पर धमकाया ही नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की गतिविधियों पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया। पीड़ित को निर्देश दिए गए कि वह हर एक-दो घंटे में अपनी कुशलता की जानकारी दें।
यदि वह घर से बाहर जाते तो उन्हें तुरंत इसकी जानकारी ठगों को देनी होती थी। बाहर से वापस लौटने पर भी उन्हें अपनी वापसी के बारे में बताना पड़ता था।
इस तरह साइबर ठगों ने करीब एक माह तक उन्हें लगातार मानसिक दबाव में रखा। फोन कॉल और वीडियो कॉल के जरिए ऐसा माहौल बनाया गया कि पीड़ित को लगता रहा कि सरकारी एजेंसियां लगातार उनकी निगरानी कर रही हैं और कोई भी गलती उन्हें गिरफ्तारी की ओर ले जा सकती है।
बैंक खाते और मोबाइल की जांच का हवाला देकर बनाया दबाव
ठगी को अंजाम देने के लिए शातिरों ने एक और चाल चली। उन्होंने बैंक खातों और मोबाइल की जांच किए जाने का हवाला दिया। इसके बाद पीड़ित को भरोसा दिलाया गया कि जांच की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए उनके पास मौजूद पूरी रकम को एक विशेष बैंक खाते में ट्रांसफर करना होगा।
लगातार मिल रही धमकियों और गिरफ्तारी के डर के बीच पीड़ित ने ठगों की बात मान ली। शातिरों ने अलग-अलग तारीखों पर रकम ट्रांसफर करवाई।
12 अगस्त को 4 लाख और 20 अगस्त को 29 लाख किए ट्रांसफर
शिकायत के अनुसार सेवानिवृत्त अधिकारी ने दबाव में आकर 12 अगस्त को 4 लाख रुपये आरटीजीएस के माध्यम से ठगों के खाते में ट्रांसफर किए।
इसके बाद ठगों का दबाव जारी रहा। 20 अगस्त को 29 लाख रुपये और आरटीजीएस के जरिए कथित ठगों के खातों में भेज दिए गए।
इस तरह दोनों लेनदेन के जरिए कुल 33 लाख रुपये ठग लिए गए। इतनी बड़ी रकम ट्रांसफर करवाने के बाद भी ठगों ने तत्काल संपर्क खत्म नहीं किया। पीड़ित करीब एक सप्ताह और उनके बनाए गए डर के माहौल में रहे।
28 अगस्त को अचानक बंद हो गए फोन और वीडियो कॉल
लगातार करीब एक महीने तक मानसिक प्रताड़ना झेलने के बाद 28 अगस्त की सुबह अचानक ठगों के फोन और वीडियो कॉल आना बंद हो गए। काफी समय तक संपर्क नहीं होने पर पीड़ित को पूरे मामले को लेकर शक हुआ।
इसके बाद उन्हें अहसास हुआ कि जिन लोगों से वह अब तक पुलिस, सीबीआई और अन्य सरकारी अधिकारियों के रूप में बात कर रहे थे, वे वास्तव में साइबर ठग थे और उन्होंने डर का माहौल बनाकर उनके साथ धोखाधड़ी की है।
एक माह तक चली इस ठगी में शातिरों ने फर्जी सरकारी पहचान, गिरफ्तारी का डर, मनी लॉन्ड्रिंग केस और निगरानी जैसे हथकंडों का इस्तेमाल किया।
साइबर क्राइम पुलिस थाना धर्मशाला में केस दर्ज
मामले की शिकायत मिलने के बाद साइबर क्राइम पुलिस थाना धर्मशाला ने प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66(डी) के तहत मामला दर्ज किया है।
पुलिस अब ठगी में इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों, बैंक खातों, लेनदेन और अन्य डिजिटल माध्यमों की जांच कर रही है। ठगों ने जिन बैंक खातों में रकम ट्रांसफर करवाई, उनकी जानकारी भी जांच का अहम हिस्सा हो सकती है।
सरकारी अधिकारी बनकर डराना बना साइबर ठगों का हथियार
इस मामले में साइबर ठगों ने डिजिटल अरेस्ट के दौरान एक के बाद एक कई पहचान का इस्तेमाल किया। पहले दूरसंचार कंपनी के अधिकारी के रूप में संपर्क किया गया, फिर पुलिस और आईपीएस अधिकारी बनने का दावा किया गया। इसके बाद कथित सीबीआई अधिकारी ने निगरानी और सुरक्षा का नाटक किया।
इस पूरी रणनीति का उद्देश्य पीड़ित को यह महसूस कराना था कि वह किसी बड़े आपराधिक मामले में फंस चुके हैं और केवल ठगों के निर्देश मानकर ही गिरफ्तारी से बच सकते हैं। इसी डर का फायदा उठाकर उनसे बड़ी रकम ट्रांसफर करवाई गई।
डिजिटल अरेस्ट में लगातार मानसिक दबाव बना सकते हैं ठग
इस घटना ने एक बार फिर दिखाया है कि साइबर अपराधी लोगों को केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाने के लिए ही नहीं, बल्कि डर और मानसिक दबाव के जरिए भी अपने नियंत्रण में ले रहे हैं। फर्जी पुलिस, सीबीआई, दूरसंचार कंपनी और बैंक अधिकारियों का नाम लेकर लोगों को धमकाना साइबर ठगी के मामलों में इस्तेमाल किए जाने वाले प्रमुख तरीकों में शामिल है।
इस मामले में भी ठगों ने करीब एक महीने तक पीड़ित को सामान्य जीवन जीने तक नहीं दिया। उन्हें हर कुछ घंटे में अपनी स्थिति बताने के लिए कहा गया और घर से बाहर जाने तथा वापस आने तक की सूचना देने को मजबूर किया गया।
अब पुलिस की जांच से यह पता लगाने की कोशिश होगी कि इस वारदात के पीछे कौन लोग हैं, रकम किन खातों में गई और इस नेटवर्क में और कितने लोग शामिल हैं।
एक फोन कॉल से शुरू हुआ डर, 33 लाख की ठगी पर खत्म हुआ मामला
30 जुलाई को आए एक फोन से शुरू हुआ यह पूरा घटनाक्रम 28 अगस्त को ठगों के अचानक संपर्क तोड़ने के बाद सामने आया। इस दौरान पीड़ित को 6.8 करोड़ रुपये के कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले, गिरफ्तारी वारंट और सरकारी एजेंसियों की कार्रवाई का डर दिखाया गया।
लगातार मानसिक दबाव के बाद 12 अगस्त को 4 लाख और 20 अगस्त को 29 लाख रुपये ट्रांसफर करवाए गए। कुल 33 लाख रुपये गंवाने के बाद जब ठगों ने संपर्क बंद किया, तब पीड़ित को समझ आया कि वह साइबर अपराधियों के जाल में फंस चुके हैं।
पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और आगामी जांच जारी है। यह घटना इस बात की गंभीर चेतावनी भी है कि फोन या वीडियो कॉल पर कोई व्यक्ति खुद को पुलिस, सीबीआई, बैंक या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर गिरफ्तारी या मनी लॉन्ड्रिंग का डर दिखाए तो बिना सत्यापन के किसी खाते में रकम ट्रांसफर नहीं करनी चाहिए।



