➤ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला- शिक्षा विभाग पर 50 हजार जुर्माना
➤ कर्मचारी को 20 साल सेवा देने के बावजूद नियमितीकरण से वंचित किया गया
➤ चार सप्ताह के भीतर सेवाएं नियमित करने और मुआवजा देने का आदेश
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग को कड़ी फटकार लगाते हुए उस पर 50 हजार रुपए जुर्माना लगाया है। अदालत ने पाया कि विभाग ने एक कर्मचारी को लगातार न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर किया और बार-बार दिए गए निर्देशों की अनदेखी की। न्यायमूर्ति संदीप शर्मा की पीठ ने इस रवैये को अहंकार से प्रेरित बताया और कहा कि जब कर्मचारी बीते 20 वर्षों से निर्बाध सेवा दे रहा है तथा सरकारी खजाने से वेतन पा रहा है, तो उसके नियमितीकरण से इंकार पूरी तरह अनुचित है।
अदालत ने आदेश दिया कि विभाग याचिकाकर्ता की सेवाओं को 2013 से नियमित करे, यानी प्रारंभिक नियुक्ति के सात साल पूरे होने के बाद। यह प्रक्रिया 28 जून 2014 की नियमितीकरण नीति के तहत चार सप्ताह के भीतर पूरी की जानी चाहिए।
याचिकाकर्ता ने 23 जून 2006 से नाहन कॉलेज में दैनिक वेतन भोगी के रूप में कार्य शुरू किया था और चौकीदारी व स्वीपर जैसे विभिन्न चतुर्थ श्रेणी पदों पर लगातार सेवाएं दीं। उन्होंने सरकार की नियमितीकरण नीति के तहत आवेदन किया था, लेकिन विभाग ने यह कहते हुए उनका अनुरोध ठुकरा दिया कि नियुक्ति नियमों के अनुरूप नहीं थी।
हाईकोर्ट ने विभाग का यह तर्क खारिज कर दिया और कहा कि जब कर्मचारी इतने वर्षों से सेवा दे रहा है, तो नियुक्ति की तकनीकी आपत्तियों के नाम पर उसे अधिकारों से वंचित करना कानून और न्याय दोनों के विपरीत है। अदालत ने यह भी कहा कि विभाग की लापरवाही के कारण याचिकाकर्ता को बार-बार कोर्ट आने पर मजबूर होना पड़ा, जो उसकी मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना का कारण बना।
इस फैसले से उन हजारों कर्मचारियों को राहत मिलने की उम्मीद है जो वर्षों से नियमितीकरण की राह देख रहे हैं और विभागीय टालमटोल का शिकार बन रहे हैं।



