हिमाचल आज अपने सबसे कठिन दौर से गुज़र रहा है। पहाड़ टूट रहे हैं, घर बह रहे हैं, मासूम ज़िंदगियां पलभर में मलबे के नीचे दब रही हैं। हर ओर चीखें हैं, हर ओर सन्नाटा है। लेकिन इस सन्नाटे से भी बड़ा मौन है—हमारे अपने ही सांसदों का। जिनकी आवाज़ गूंजनी चाहिए थी, वो आज कहीं सुनाई नहीं दे रही। सवाल पहाड़ों की रग-रग में दौड़ रहा है—“हिमाचल लहूलुहान है… पर हमारे सांसद कहाँ हैं?” ओजस्वी चौहान की कलम से …..
➤ हिमाचल प्राकृतिक आपदा से कराह रहा है लेकिन सांसदों की आवाज़ गायब
➤ चार लोकसभा और तीन राज्यसभा सांसद संकट की घड़ी में नदारद
➤ जनता सवाल पूछ रही – अगर संकट में साथ नहीं तो संसद में भेजने का क्या औचित्य
सोचिए ज़रा, पूरा हिमाचल चीख रहा है, मदद के लिए पुकार रहा है। बरसात ने ज़िंदगियाँ छीन लीं, भूस्खलन ने घर जड़ से उखाड़ दिए, खेत-खलिहान मलबे में बदल गए। लेकिन इन सबसे बड़ा सन्नाटा है, दिल्ली में बैठे हमारे ही सांसदों का। हिमाचल जैसे छोटे से राज्य से सात सांसद चुने गए थे, ताकि संसद में हमारी आवाज़ गूंजे। लेकिन आज जब प्रदेश लहूलुहान है, तब न ये आवाज़ सुनाई दे रही है, न कोई असर दिख रहा है।
Main body: हिमाचल की घाटियाँ लगातार बरसात, भूस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रही हैं। घर उजड़ रहे हैं, खेत बह रहे हैं, लोग अपनों को खो रहे हैं। लेकिन इस पूरे दौर में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है, आखिर हमारे सात सांसद कहाँ हैं?
छोटे से राज्य हिमाचल से चार लोकसभा और तीन राज्यसभा सांसद दिल्ली भेजे गए हैं, ताकि वहाँ बैठकर हिमाचल की आवाज़ बुलंद कर सकें। लेकिन आज जब प्रदेश को सबसे ज़्यादा उनकी ज़रूरत है, तब या तो ये चुप हैं या इनकी मौजूदगी का कोई असर दिखाई नहीं दे रहा।
लोकसभा सांसद
1. कांगड़ा – डॉ. राजीव भारद्वाज
2. मंडी – कंगना रनौत
3. हमीरपुर – अनुराग ठाकुर
4. शिमला – सुरेश कुमार कश्यप
राज्यसभा सांसद
1. हर्ष महाजन
2. इंदु गोस्वामी
3. सिकंदर कुमार
अब ज़रा इनकी भूमिका पर गौर कीजिए…………….
कंगना रनौत: पिछले एक महीने से हिमाचल से नदारद। जुलाई में जब आईं तो बाढ़ग्रस्त इलाकों में घूमते हुए उन्होंने साफ़ कहा कि न तो उनके पास कोई राहत कोष है और न ही कोई कैबिनेट पद। यानी जनता को यह संदेश कि उनके पास देने के लिए कुछ नहीं है। जबकि उनके संसदीय क्षेत्र मंडी के सिराज और भरमौर — इस आपदा में सबसे ज़्यादा प्रभावित रहे हैं।
डॉ. राजीव भारद्वाज, इंदु गोस्वामी और हर्ष महाजन: ये सभी कांगड़ा-चंबा बेल्ट से आते हैं, जो इस बार भारी तबाही झेल चुका है। लेकिन इनकी आवाज़ दिल्ली तक क्यों नहीं पहुँच रही?
अनुराग ठाकुर: केंद्र में उनकी हैसियत इतनी मज़बूत है कि उन्हें पूरे हिमाचल के लिए लड़ना चाहिए। लेकिन क्या उन्होंने वह दबाव बनाने की कोशिश की, जिसकी उनसे उम्मीद थी?
सुरेश कश्यप: शिमला, सोलन और सिरमौर जैसे प्रभावित जिलों का प्रतिनिधित्व करते हैं। क्या इन इलाकों के दर्द को दिल्ली तक पहुँचा पाए?
यही नहीं, हिमाचल से ही आने वाले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा* का ज़िक्र करना भी ज़रूरी है। यही वह धरती है, जहाँ से उनकी राजनीति शुरू हुई। लेकिन क्या उन्होंने इस संकट की घड़ी में अपने ही प्रदेश के लिए कुछ ठोस किया?
और सबसे बड़ा सवाल, प्रधानमंत्री ने पंजाब में बाढ़ आने पर वहाँ के मुख्यमंत्री को व्यक्तिगत रूप से फ़ोन कर स्थिति जानी। यह एक सराहनीय कदम था। लेकिन हिमाचल, जो महीनों से लगातार प्राकृतिक आपदाओं से कराह रहा है, उसके मुख्यमंत्री को एक बार भी फ़ोन नहीं किया। आखिर क्यों? क्या हिमाचल की पीड़ा इतनी छोटी है कि उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाए?
विधानसभा में मुख्यमंत्री ने प्रदेश को आपदाग्रस्त घोषित कर दिया, सरकार और विपक्ष दोनों ने मिलकर केंद्र को राहत पैकेज का प्रस्ताव भेजा। लेकिन जिन सांसदों का धर्म था कि दिल्ली में इस प्रस्ताव को ज़ोरदार ढंग से उठाएँ, उस पर दबाव बनाएँ, वे कहीं दिखाई नहीं देते।
हिमाचल के लोग अब यह सवाल पूछ रहे हैं, अगर उनके चुने हुए सांसद इस घड़ी में उनके साथ नहीं खड़े हो सकते, तो आखिर उन्हें संसद में भेजने का क्या औचित्य है?



