➤ हिमाचल विधानसभा में बड़ा संशोधन विधेयक पेश, अयोग्य घोषित विधायकों की पेंशन पर रोक का प्रस्ताव
➤ 14वीं विधानसभा और इसके बाद के अयोग्य सदस्यों पर लागू होगा नया नियम
➤ विधेयक पारित होने पर दल-बदल कानून के तहत अयोग्य ठहराए गए पूर्व विधायकों की पेंशन बंद हो सकती है
शिमला। हिमाचल प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में बुधवार देर शाम एक बड़ा और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक पेश किया गया। इस विधेयक के तहत अयोग्य घोषित विधायकों को अब पेंशन नहीं मिलेगी। सरकार ने साफ किया है कि यह प्रावधान मौजूदा 14वीं विधानसभा और इसके बाद चुने जाने वाले विधायकों पर लागू होगा। यह विधेयक बजट सत्र के अंतिम दिन गुरुवार को पारित होने के लिए सदन में रखा गया है।
मुख्यमंत्री Sukhvinder Singh Sukhu ने सदन में विधानसभा सदस्यों के भत्ते एवं पेंशन संशोधन विधेयक 2026 पेश किया। इससे पहले 2024 में लाए गए पुराने संशोधन विधेयक को वापस लेने का प्रस्ताव भी सदन के पटल पर रखा गया, क्योंकि उसे आवश्यक संवैधानिक मंजूरी नहीं मिल सकी थी। सरकार ने अब नए प्रारूप में संशोधन लाकर इसे दोबारा पेश किया है।
नए संशोधन के अनुसार, यदि कोई विधायक 14वीं विधानसभा या उसके बाद निर्वाचित होकर बाद में अयोग्य घोषित होता है, तो वह इस अधिनियम के तहत पेंशन का हकदार नहीं होगा। सरकार ने इसे “सांविधानिक पाप के निवारण” के लिए जरूरी कदम बताया है। इस प्रावधान का सीधा असर उन विधायकों पर पड़ेगा जो दल-बदल कानून के तहत अयोग्य घोषित किए गए थे।
विधानसभा में पेश विधेयक के अनुसार, यह नियम पिछली विधानसभाओं के अयोग्य विधायकों पर लागू नहीं होगा। यानी इसका प्रभाव केवल वर्तमान और भविष्य की विधानसभाओं तक सीमित रहेगा। यह कदम राज्य की राजनीति में दल-बदल की घटनाओं पर अंकुश लगाने के तौर पर भी देखा जा रहा है।
यदि यह संशोधन विधेयक पारित हो जाता है, तो गगरेट के पूर्व विधायक चैतन्य शर्मा और देवेंद्र कुमार भुट्टो की पेंशन बंद हो सकती है। ये दोनों 2024 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा के साथ जाने के बाद दल-बदल कानून के तहत अयोग्य घोषित किए गए विधायकों में शामिल थे। अन्य नामों में Sudhir Sharma, इंद्रदत्त लखनपाल, राजेंद्र राणा और रवि ठाकुर शामिल थे। इनमें से कुछ उपचुनाव जीतकर फिर सदन में लौटे, जबकि कुछ चुनाव हार गए।
इस विधेयक को राजनीतिक हलकों में एक बड़ा संदेश माना जा रहा है। माना जा रहा है कि सरकार भविष्य में विधायकों के दल-बदल पर सख्त रुख अपनाने और संवैधानिक अनुशासन बनाए रखने के लिए यह कदम उठा रही है।



