➤ जॉब ट्रेनी मेडिकल ऑफिसर (स्पेशलिस्ट) का वेतन 33,660 रुपये से बढ़ाकर 60 हजार रुपये किया गया
➤ सरकार ने विशेषज्ञ डॉक्टरों को सरकारी अस्पतालों की ओर आकर्षित करने के लिए लिया बड़ा फैसला
➤ पीजी स्टाइपेंड, सीनियर रेजिडेंट और सुपर स्पेशलिस्ट के भत्तों में भी पहले ही हो चुकी है बड़ी बढ़ोतरी
शिमला। हिमाचल प्रदेश सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा फैसला लेते हुए जॉब ट्रेनी मेडिकल ऑफिसर (स्पेशलिस्ट) के वेतन में 78 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दी है। अब इन डॉक्टरों को पहले के 33,660 रुपये की जगह 60,000 रुपये प्रतिमाह मिलेंगे। सरकार का मानना है कि इस निर्णय से विशेषज्ञ डॉक्टरों का सरकारी अस्पतालों की ओर रुझान बढ़ेगा और दूरदराज के क्षेत्रों में भी बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हो सकेंगी।
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने कहा कि वर्ष 2022 में छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद जॉब ट्रेनी मेडिकल ऑफिसर (स्पेशलिस्ट) का वेतन करीब 27 हजार रुपये से बढ़ाकर 33,660 रुपये किया गया था। अब वर्तमान सरकार ने इसमें सीधे 78 प्रतिशत की वृद्धि करते हुए इसे 60 हजार रुपये कर दिया है। यह फैसला राज्य के स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
सरकार का कहना है कि विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी दूर करने और उन्हें सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में सेवाएं देने के लिए प्रोत्साहित करना इस निर्णय का मुख्य उद्देश्य है। खासकर ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने में यह फैसला अहम भूमिका निभाएगा।
राज्य सरकार इससे पहले भी मेडिकल कॉलेजों में अध्ययनरत पीजी विद्यार्थियों के स्टाइपेंड में उल्लेखनीय वृद्धि कर चुकी है। प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों का स्टाइपेंड 40 हजार रुपये से बढ़ाकर 50 हजार रुपये, द्वितीय वर्ष का 45 हजार से 60 हजार रुपये तथा तृतीय वर्ष का 50 हजार से बढ़ाकर 65 हजार रुपये किया गया है।
इसके अलावा सीनियर रेजिडेंट, ट्यूटर स्पेशलिस्ट और सुपर स्पेशलिस्ट के स्टाइपेंड में भी 50 से 170 प्रतिशत तक की वृद्धि की जा चुकी है। सीनियर रेजिडेंट और ट्यूटर स्पेशलिस्ट का मासिक स्टाइपेंड बढ़ाकर एक लाख रुपये, जबकि सुपर स्पेशलिस्ट और सीनियर रेजिडेंट (सुपर स्पेशलिस्ट) का स्टाइपेंड 1.30 लाख रुपये प्रतिमाह किया गया है।
सरकार का मानना है कि इन फैसलों से राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ेगी और मरीजों को सरकारी अस्पतालों में बेहतर एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंगी।



