Follow Us:

डिजिटल अरेस्ट पर हिमाचल पुलिस का बड़ा प्लान, अब ऐसे बचाएंगे बैंक

➤ हिमाचल में डिजिटल अरेस्ट रोकने के लिए बैंक बनेंगे पहली सुरक्षा दीवार
➤ 70 लाख रुपये बचाने के बाद पुलिस-बैंक मिलकर तैयार करेंगे नया तंत्र
➤ संदिग्ध बड़े लेनदेन पर बैंक कर्मचारी रखेंगे नजर, साइबर पुलिस को देंगे सूचना


शिमला। हिमाचल प्रदेश में बढ़ते डिजिटल अरेस्ट के मामलों के बीच पुलिस अब बैंकों के साथ मिलकर साइबर ठगी की रकम को खातों से बाहर जाने से रोकने पर विशेष जोर देगी। इसके लिए पुलिस और बैंक प्रबंधन मिलकर एक ऐसा समन्वित तंत्र तैयार करेंगे, जिसमें बैंक कर्मचारी संदिग्ध लेनदेन पर समय रहते नजर रखेंगे और जरूरत पड़ने पर साइबर पुलिस को तत्काल सूचना देंगे।

डिजिटल अरेस्ट के मामलों में साइबर ठग फोन या वीडियो कॉल के जरिए लोगों को अपने नियंत्रण में लेते हैं। आरोपी खुद को पुलिस अधिकारी, सीबीआई या ईडी का अधिकारी बताकर पीड़ित को गिरफ्तारी का डर दिखाते हैं। इसके बाद उससे खाते में रकम जमा करने या किसी दूसरे खाते में पैसे ट्रांसफर करने के निर्देश दिए जाते हैं। ऐसे मामलों में बैंक शाखा पीड़ित और साइबर ठग के बीच अंतिम सुरक्षा दीवार की भूमिका निभा सकती है।

हिमाचल में इस व्यवस्था की जरूरत को हमीरपुर की एक घटना ने भी सामने रखा है। यहां पंजाब नेशनल बैंक के अधिकारियों की सतर्कता के चलते 78 वर्षीय बुजुर्ग की 70 लाख रुपये की जमा-पूंजी बच गई। इस घटना ने यह स्पष्ट किया कि बैंक कर्मचारी समय रहते असामान्य लेनदेन को पहचान लें तो साइबर ठगी से होने वाले बड़े वित्तीय नुकसान को रोका जा सकता है।

अचानक बड़ी रकम निकालने और एफडी तोड़ने पर रहेगी नजर

पुलिस और बैंक मिलकर तैयार किए जा रहे नए तंत्र के तहत बैंक कर्मचारियों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने के लिए कहा जाएगा। कर्मचारी खातों से अचानक बड़ी रकम निकालने, एफडी तोड़ने या असामान्य तरीके से धनराशि दूसरे खाते में ट्रांसफर करने के प्रयासों पर विशेष ध्यान देंगे।

सिर्फ लेनदेन ही नहीं, बल्कि ग्राहक के व्यवहार में होने वाले बदलाव को भी महत्वपूर्ण संकेत माना जाएगा। यदि कोई ग्राहक अचानक दबाव में दिखाई देता है या किसी अज्ञात व्यक्ति के निर्देश पर बड़ी रकम निकालने अथवा ट्रांसफर करने की कोशिश करता है तो बैंक कर्मचारी उससे बातचीत कर वास्तविक स्थिति समझने का प्रयास करेंगे।

इस दौरान बैंक कर्मचारियों को ग्राहक के साथ संवेदनशील तरीके से बातचीत करने पर भी जोर दिया जाएगा, ताकि साइबर ठगों के दबाव में आए व्यक्ति को विश्वास में लेकर स्थिति को समझा जा सके।

जरूरत पड़ते ही साइबर पुलिस को दी जाएगी सूचना

यदि बैंक को किसी लेनदेन या ग्राहक के व्यवहार में साइबर ठगी का संदेह होता है तो निर्धारित प्रक्रिया के तहत साइबर पुलिस को तत्काल सूचना दी जाएगी। इसके लिए पुलिस और बैंक अधिकारियों के बीच नियमित समन्वय स्थापित किया जाएगा।

जिला स्तर पर पुलिस और प्रमुख बैंकों के नोडल अधिकारियों के बीच संपर्क व्यवस्था भी बनाई जाएगी। इसके माध्यम से साइबर ठगी के नए तरीकों, संदिग्ध खातों और उनके लेनदेन से जुड़े पैटर्न की जानकारी एक-दूसरे के साथ साझा की जाएगी।

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि साइबर ठगों के हाथ में रकम पहुंचने के बाद कार्रवाई करने के बजाय पैसे के खाते से बाहर जाने से पहले ही हस्तक्षेप किया जा सके।

बैंक कर्मचारियों को डिजिटल अरेस्ट के संकेत पहचानने की ट्रेनिंग

नई व्यवस्था में बैंक कर्मचारियों को डिजिटल अरेस्ट के संकेत पहचानने का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। इसमें विशेष रूप से बुजुर्ग खाताधारकों के लेनदेन और फोन पर मिलने वाले अज्ञात निर्देशों पर ध्यान देने की जानकारी दी जाएगी।

बैंक कर्मचारियों को यह भी समझाया जाएगा कि डिजिटल अरेस्ट के दौरान पीड़ित व्यक्ति अक्सर डर और मानसिक दबाव में होता है। ऐसे में उससे सामान्य तरीके से पूछताछ करने के बजाय उसे विश्वास में लेकर बातचीत करना जरूरी होगा, ताकि वह ठगों के प्रभाव से बाहर आकर वास्तविक स्थिति बता सके।

बैंक शाखाओं में भी इस संबंध में स्पष्ट संदेश देने की व्यवस्था की जाएगी, ताकि ग्राहक यह समझ सकें कि किसी भी जांच एजेंसी की ओर से इस तरह के निर्देश मिलने पर उन्हें तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए।

पुलिस ने साफ किया- वीडियो कॉल पर कोई एजेंसी डिजिटल अरेस्ट नहीं करती

हिमाचल पुलिस की ओर से लोगों को यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया जाएगा कि कोई भी जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर डिजिटल अरेस्ट नहीं करती। इसी तरह गिरफ्तारी से बचने के नाम पर किसी व्यक्ति को खाते में रकम जमा करने या दूसरे खाते में ट्रांसफर करने के लिए भी नहीं कहा जाता।

साइबर ठग इसी डर का फायदा उठाते हैं। वे खुद को पुलिस, सीबीआई या ईडी का अधिकारी बताकर व्यक्ति को यह विश्वास दिलाते हैं कि वह किसी गंभीर मामले में फंस गया है। इसके बाद गिरफ्तारी का भय पैदा कर पैसे ट्रांसफर करवाने की कोशिश की जाती है।

ऐसे मामलों में यदि बैंक कर्मचारी को ग्राहक के व्यवहार और लेनदेन में असामान्य स्थिति दिखाई देती है तो समय पर हस्तक्षेप करके नुकसान को रोका जा सकता है।

डीजीपी अशोक तिवारी बोले- बैंक की सतर्कता से काफी हद तक बच सकता है नुकसान

प्रदेश पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी का कहना है कि साइबर ठगों की ओर से किए जाने वाले डिजिटल अरेस्ट के मामलों में यदि बैंक कर्मी सतर्कता बरतें तो प्रभावित लोगों को होने वाले वित्तीय नुकसान से काफी हद तक बचाया जा सकता है।

पुलिस महानिदेशक के अनुसार बैंक प्रबंधन और पुलिस इस दिशा में साझा कार्ययोजना तैयार करेंगे। इसका उद्देश्य साइबर ठगी की रकम को खातों से बाहर जाने से रोकना और संदिग्ध लेनदेन की जानकारी पुलिस तक तेजी से पहुंचाना है।

इस पूरी व्यवस्था में बैंक कर्मचारियों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि ठगों के दबाव में आया व्यक्ति भले ही लगातार उनके निर्देशों का पालन कर रहा हो, लेकिन बैंक स्तर पर होने वाली सतर्कता उसके पैसे को बाहर जाने से रोकने का आखिरी मौका साबित हो सकती है।