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हिमाचल के सावन बरवाल ने एशियाड में रचा इतिहास, मैराथन में जीता सिल्वर; 44 साल बाद भारत को मिला पदक

➤ जोगिंद्रनगर के सावन बरवाल ने 42.195 किमी मैराथन में जीता रजत पदक
➤ 2 घंटे 11 मिनट 36 सेकंड में दौड़ पूरी कर अपना राष्ट्रीय रिकॉर्ड सुधारा
➤ 44 साल बाद एशियाई खेलों की पुरुष मैराथन में भारत को मिला पदक


जोगिंद्रनगर/मंडी। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के जोगिंद्रनगर से ताल्लुक रखने वाले धावक सावन बरवाल ने एशियाई खेलों में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत के लिए रजत पदक जीतकर इतिहास रच दिया है। जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियाई खेलों में सावन ने पुरुषों की 42.195 किलोमीटर मैराथन दौड़ को 2 घंटे 11 मिनट 36 सेकंड में पूरा किया। इस प्रदर्शन के साथ उन्होंने अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड बेहतर कर दिया। सावन की इस उपलब्धि ने भारत के लिए भी ऐतिहासिक इंतजार खत्म किया है, क्योंकि पुरुष मैराथन में भारत को 44 साल बाद एशियाई खेलों का पदक मिला है।

सावन बरवाल की यह कामयाबी सिर्फ एक पदक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिमाचल के उस युवा धावक की मेहनत और निरंतर संघर्ष का परिणाम है, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन किया है। मैराथन जैसी कठिन स्पर्धा में 42 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करते हुए सावन ने पूरी दौड़ में खुद को पदक की दौड़ में बनाए रखा और आखिरकार रजत पदक अपने नाम किया।

44 साल बाद भारत को मिला मैराथन पदक

सावन बरवाल की उपलब्धि इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि भारत को पुरुषों की मैराथन में एशियाई खेलों का पदक इससे पहले 1982 के दिल्ली एशियाई खेलों में मिला था। इसके बाद इस स्पर्धा में भारत लंबे समय तक पदक का इंतजार करता रहा।

सावन ने इस इंतजार को खत्म करते हुए एशियाई खेलों के इतिहास में मैराथन पदक जीतने वाले भारत के चौथे धावक बनने की उपलब्धि हासिल की। उनकी इस कामयाबी के बाद जोगिंद्रनगर से लेकर पूरे मंडी जिले में खुशी का माहौल है।

2 घंटे 11 मिनट 36 सेकंड में पूरी की दौड़

सावन ने पुरुष मैराथन की 42.195 किलोमीटर की दूरी 2:11:36 के समय में पूरी की। इस प्रदर्शन के दौरान वह दौड़ के शुरुआती और मध्य चरण में लगातार अग्रणी धावकों के साथ बने रहे।

21 किलोमीटर के पड़ाव तक सावन दूसरे स्थान पर थे। इसके बाद भी उन्होंने अपनी रफ्तार और लय बनाए रखी और 35 किलोमीटर तक पदक की स्थिति में बने रहे। दौड़ के अंतिम चरण में जापान के धावक ने बढ़त बनाई, लेकिन सावन ने दबाव के बावजूद अपनी गति कायम रखी और दूसरे स्थान पर रहते हुए रजत पदक पक्का कर लिया।

दौड़ में जापान के इचिटाका यामाशिता ने स्वर्ण पदक जीता, जबकि चीन के फेंग पेइयू को कांस्य पदक मिला।

अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड किया बेहतर

एशियाई खेलों में रजत पदक जीतने के साथ सावन बरवाल ने अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बेहतर कर दिया। इससे पहले इसी साल अप्रैल में रॉटरडैम मैराथन में सावन ने 2 घंटे 11 मिनट 58 सेकंड का समय दर्ज किया था।

उस प्रदर्शन के साथ उन्होंने 1978 से कायम शिवनाथ सिंह के 2 घंटे 12 मिनट के राष्ट्रीय रिकॉर्ड को पीछे छोड़ा था। अब एशियाई खेलों में 2:11:36 का समय निकालकर सावन ने अपने ही रिकॉर्ड को और बेहतर कर दिया है।

जोगिंद्रनगर के धावक की अंतरराष्ट्रीय पहचान मजबूत

सावन बरवाल की इस सफलता से जोगिंद्रनगर और मंडी का नाम अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर एक बार फिर चमका है। पहाड़ी क्षेत्र से निकलकर लंबी दूरी की दौड़ में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले सावन ने एशियाई खेलों में रजत पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया है।

उनकी जीत की खबर सामने आने के बाद जोगिंद्रनगर और मंडी जिले में खुशी का माहौल है। सावन के शुरुआती खेल प्रशिक्षक गोपाल ठाकुर ने भी उनकी ऐतिहासिक उपलब्धि पर खुशी जताई है।

हिमाचल के खाते में जुड़ी बड़ी खेल उपलब्धि

एशियाई खेलों में हिमाचल प्रदेश के खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन लगातार चर्चा में है। महिला कबड्डी में हिमाचल की खिलाड़ियों ने स्वर्ण पदक जीतने में अहम भूमिका निभाई है, जबकि अब मंडी के सावन बरवाल ने पुरुष मैराथन में रजत पदक जीतकर प्रदेश का गौरव बढ़ाया है।

सावन की उपलब्धि यह भी दिखाती है कि हिमाचल की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों से निकलने वाले खिलाड़ी लंबी दूरी और धैर्य से जुड़ी खेल स्पर्धाओं में देश के लिए बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं।

अब नजरें आगे की चुनौतियों पर

एशियाई खेलों में रजत पदक जीतने के साथ सावन बरवाल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति और मजबूत की है। राष्ट्रीय रिकॉर्ड को लगातार बेहतर करने और एशियाई खेलों में पदक जीतने के बाद उनकी आगे की यात्रा पर खेल प्रेमियों की नजर रहेगी।

जोगिंद्रनगर के इस धावक ने एक बार फिर साबित किया है कि लगन, मेहनत और लगातार बेहतर प्रदर्शन के दम पर पहाड़ी क्षेत्र से निकलकर अंतरराष्ट्रीय खेल मंच तक पहुंचा जा सकता है। सावन बरवाल का यह रजत पदक हिमाचल और भारत दोनों के लिए यादगार उपलब्धि बन गया है।