➤ 10 हजार मीटर में कांस्य के बाद अब 5000 मीटर में स्वर्ण पर नजर
➤ चंबा की सीमा ने कहा- पदक जीती तो मां केसरी देवी को करूंगी समर्पित
➤ 12 साल की उम्र में पिता को खोया, संघर्ष के दम पर एशियाड तक पहुंची
धर्मशाला/चंबा। एशियन गेम्स 2026 में हिमाचल प्रदेश के चंबा की धावक सीमा ने 10 हजार मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतकर देश और प्रदेश का नाम रोशन किया है। अब उनकी नजर इससे आगे बढ़कर स्वर्ण पदक पर है। सीमा 28 सितंबर को 5000 मीटर स्पर्धा में ट्रैक पर उतरेंगी। जापान से बातचीत में सीमा ने साफ कहा है कि इस बार उनका लक्ष्य सिर्फ स्वर्ण पदक है और वह पूरी तैयारी के साथ मुकाबले में उतरेंगी। इस स्पर्धा में भारत की पारुल चौधरी भी चुनौती पेश करेंगी।
सीमा के लिए 5000 मीटर की यह दौड़ सिर्फ एक खेल मुकाबला नहीं है, बल्कि वर्षों के संघर्ष और अपनी मां के त्याग को सम्मान देने का मौका भी है। सीमा ने कहा कि उनकी सफलता में उनकी मां केसरी देवी का सबसे बड़ा योगदान है। वह जो भी पदक जीतेंगी, उसे अपनी मां को समर्पित करेंगी। सीमा का कहना है कि उनकी मां ने बेटी के सपने को पूरा करने के लिए बेहद मुश्किल परिस्थितियों में उनका साथ दिया और आज वह जिस मुकाम पर पहुंची हैं, उसमें मां की भूमिका सबसे बड़ी है।
10 हजार मीटर में कांस्य के बाद बढ़ा आत्मविश्वास
एशियन गेम्स में सीमा ने 10 हजार मीटर स्पर्धा में कांस्य पदक हासिल किया है। इस उपलब्धि के बाद उनका आत्मविश्वास और बढ़ा है। हालांकि, अब वह अपने पिछले प्रदर्शन पर रुकना नहीं चाहतीं और 5000 मीटर में पदक का रंग बदलने के इरादे से उतरेंगी।
सीमा ने कहा कि उनकी तैयारी अच्छी है और वह अपनी रणनीति के मुताबिक दौड़ेंगी। वह भारतीय धाविका पारुल चौधरी के साथ अभ्यास भी कर रही हैं। सीमा के मुताबिक उनका तत्काल लक्ष्य 28 सितंबर को होने वाली 5000 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक हासिल करना है।
चंबा के रेटा गांव से एशियाड के ट्रैक तक पहुंची सीमा
चंबा के रेटा गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने वाली सीमा की कहानी संघर्ष से भरी रही है। उन्होंने बेहद कठिन परिस्थितियों के बीच अपने दौड़ने के जुनून को जारी रखा। महज 12 साल की उम्र में पिता को खोने के बाद परिवार की जिम्मेदारियों और सीमित आर्थिक परिस्थितियों के बीच भी सीमा ने अपने खेल का सफर नहीं छोड़ा।
सीमा की मां केसरी देवी ने बेटी के सपने को आगे बढ़ाने में हरसंभव सहयोग किया। यही वजह है कि सीमा अपनी हर उपलब्धि का श्रेय अपनी मां को देती हैं। एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीतने के बाद अब जब वह स्वर्ण के लिए दौड़ने जा रही हैं तो उनके पीछे मां के वर्षों के संघर्ष की कहानी भी जुड़ी हुई है।
सीमा के लिए पदक से ज्यादा मायने रखती है मां की खुशी
सीमा ने कहा कि वह जो भी पदक जीतेंगी, उसे अपनी मां को देंगी। उन्होंने अपनी मां को अपनी ताकत बताया है। सीमा के मुताबिक मां ने उनके लिए जो संघर्ष किया है, उसे वह कभी भूल नहीं सकतीं।
सीमा की इस बात से साफ है कि 28 सितंबर की दौड़ उनके लिए केवल पदक की लड़ाई नहीं होगी। उनके लिए यह उस संघर्ष को सम्मान देने का मौका भी होगा, जिसके दम पर उन्होंने गांव की पगडंडियों से अंतरराष्ट्रीय ट्रैक तक का सफर तय किया।
अब लक्ष्य स्वर्ण, इसके बाद ओलंपिक की तैयारी
10 हजार मीटर में कांस्य पदक जीतने के बाद सीमा का अगला लक्ष्य 5000 मीटर में स्वर्ण पदक हासिल करना है। इसके बाद वह अपने करियर को अगले बड़े लक्ष्य यानी ओलंपिक की दिशा में आगे बढ़ाना चाहती हैं।
सीमा ने कहा कि एशियन गेम्स उनके सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है और वह इसे पार कर अगले लक्ष्य की तैयारी करना चाहती हैं। 28 सितंबर को जब वह 5000 मीटर के ट्रैक पर उतरेंगी तो हिमाचल के चंबा से लेकर पूरे देश की नजर उनके प्रदर्शन पर रहेगी।
हिमाचल के लिए एक और गौरव का मौका
चंबा की सीमा का एशियन गेम्स में पदक जीतना हिमाचल प्रदेश के लिए पहले ही गौरव की बात है। अब 5000 मीटर में उनका स्वर्ण के लिए उतरना प्रदेश के खेल प्रेमियों की उम्मीदें और बढ़ा रहा है।
सीमा की कहानी सिर्फ एक धाविका की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि संघर्ष, मां के त्याग और लक्ष्य के प्रति समर्पण की कहानी भी है। 28 सितंबर को सीमा एक बार फिर ट्रैक पर उतरेंगी और इस बार उनकी नजर कांस्य से आगे बढ़कर स्वर्ण पदक पर होगी।



