➤ हिमाचल में सेब कारोबार डेढ़ करोड़ पेटियों तक सिमटने का अनुमान
➤ बागवानों की कमाई घटने से परिवहन, पैकिंग और स्थानीय बाजारों पर भी असर
➤ बागवानी विभाग के अनुसार प्रदेश को 800 से 1,000 करोड़ रुपये तक का नुकसान संभव
शिमला। हिमाचल प्रदेश की आर्थिकी की रीढ़ माने जाने वाले सेब कारोबार पर इस बार मौसम की बेरुखी भारी पड़ी है। सेब उत्पादन और मंडियों में पहुंचने वाली पेटियों की संख्या में बड़ी गिरावट के कारण प्रदेश के बागवानों की कमाई प्रभावित हुई है। पिछले साल जहां हिमाचल की मंडियों में करीब 2.65 करोड़ पेटियां पहुंची थीं, वहीं इस बार यह आंकड़ा घटकर लगभग डेढ़ करोड़ पेटियों तक सिमटने का अनुमान है। बागवानी विभाग के आकलन के मुताबिक, सेब कारोबार में आई इस गिरावट से प्रदेश की अर्थव्यवस्था को 800 से 1,000 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है।
शिमला, कुल्लू, मंडी और किन्नौर जिलों में हजारों परिवारों की आजीविका सेब बागवानी पर निर्भर है। ऐसे में इस बार कम कारोबार का असर केवल बागवानों की आमदनी तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे परिवहन, पैकिंग, मजदूरी और स्थानीय बाजारों से जुड़े कारोबार भी प्रभावित हो रहे हैं। सेब सीजन के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलता है। फसल मंडियों तक पहुंचाने से लेकर पेटियों की पैकिंग, ढुलाई और बिक्री तक कई तरह की आर्थिक गतिविधियां चलती हैं। सेब की कम आवक ने इन गतिविधियों की रफ्तार भी धीमी कर दी है।
सेब सीजन अब अंतिम दौर में पहुंच चुका है। आने वाले दिनों में किन्नौर के ऊंचाई वाले क्षेत्रों से कुछ खेप मंडियों में पहुंचने की उम्मीद है, लेकिन इससे कुल कारोबार में बड़ी बढ़ोतरी होने की संभावना कम बताई जा रही है। मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को इस बार सेब सीजन की कमजोरी की प्रमुख वजहों में गिना जा रहा है।
बागवानों की आमदनी घटी, कर्ज की किस्तें चुकाना मुश्किल
सेब की फसल कम होने से बागवानों की आय पर सीधा असर पड़ा है। कई बागवान खेती और बागीचों के रखरखाव के लिए कर्ज लेते हैं। उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा सेब बेचने के बाद मिलने वाली रकम से आता है। इस बार कारोबार कमजोर रहने के कारण कुछ बागवानों के सामने बैंकों की किस्तें चुकाने और घरेलू खर्च पूरे करने की चुनौती खड़ी हो गई है।
बागवानी से होने वाली कमाई का इस्तेमाल परिवारों की रोजमर्रा की जरूरतों के अलावा कपड़े, कृषि उपकरण, निर्माण सामग्री और अन्य वस्तुओं की खरीद में भी होता है। जब बागवानों के हाथ में पैसा कम पहुंचता है तो उनकी खरीद क्षमता घट जाती है। इसका असर ग्रामीण दुकानदारों, व्यापारियों और दूसरे छोटे कारोबारियों पर भी पड़ता है। इस तरह सेब सीजन में आई गिरावट का प्रभाव प्रदेश की अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों तक पहुंच रहा है।
2,500 करोड़ रुपये तक सिमट सकता है सेब कारोबार
बागवानी विभाग के अनुमान के अनुसार, इस बार हिमाचल प्रदेश में सेब कारोबार करीब 2,500 करोड़ रुपये तक सिमट सकता है। राज्य बागवानी विभाग के निदेशक डॉ. सतीश शर्मा के अनुसार, प्रदेश में औसतन सेब सीजन का कारोबार 3,000 से 3,500 करोड़ रुपये के बीच रहता है। यदि अन्य बागवानी फसलों को भी शामिल किया जाए तो प्रदेश में फलों का कुल कारोबार लगभग 5,000 करोड़ रुपये सालाना तक पहुंच जाता है।
विभाग के आकलन के मुताबिक, यदि इस बार सेब मंडियों में पहुंचने वाली पेटियों की संख्या डेढ़ करोड़ के आसपास ही रहती है तो प्रदेश को 800 से 1,000 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है। हालांकि, नुकसान की वास्तविक स्थिति का आकलन सेब सीजन पूरी तरह समाप्त होने के बाद ही किया जा सकेगा।
अच्छे दाम से कुछ राहत, लेकिन कम उत्पादन की भरपाई मुश्किल
विशेषज्ञों के अनुसार, सेब की कम आवक के बीच बागवानों को फसल के अपेक्षाकृत अच्छे दाम मिलने से कुछ राहत मिली है। यदि कीमतों में यह सहारा नहीं मिलता तो कारोबार का कुल मूल्य और नीचे जा सकता था। रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से आशंका जताई गई है कि ऐसी स्थिति में हिमाचल का सेब कारोबार करीब 1,500 करोड़ रुपये तक गिर सकता था।
हालांकि, बेहतर दाम मिलने के बावजूद कम उत्पादन और कम पेटियों की भरपाई पूरी तरह होना मुश्किल है। जिन बागवानों के पास बिक्री के लिए कम फसल है, उनकी कुल आमदनी पर इसका असर बना हुआ है। यही वजह है कि इस बार सेब कारोबार की स्थिति का आकलन केवल बाजार भाव के आधार पर नहीं, बल्कि कुल उत्पादन, मंडियों में पहुंची पेटियों और बागवानों की वास्तविक कमाई को ध्यान में रखकर किया जा रहा है।
राज्य के राजस्व पर भी पड़ सकता है असर
अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ डॉ. राकेश शर्मा, एसोसिएट प्रोफेसर अर्थशास्त्र, के अनुसार, सेब कारोबार में गिरावट का असर प्रदेश की अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में दिखाई दे सकता है। जब एक बड़े क्षेत्र में आमदनी घटती है तो उससे जुड़े दूसरे व्यवसायों में भी मांग कम होने लगती है। इससे कारोबार और रोजगार दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
सेब की ढुलाई कम होने से परिवहन क्षेत्र में काम घटता है। पैकिंग और मजदूरी से जुड़े लोगों को कम काम मिल सकता है। वहीं, बागवानों की खरीद क्षमता घटने से स्थानीय बाजारों में वस्तुओं की बिक्री भी प्रभावित हो सकती है। विभिन्न क्षेत्रों में कारोबार कम होने का असर राज्य सरकार के राजस्व पर भी पड़ सकता है। इससे प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर अतिरिक्त दबाव बनने की आशंका है।
कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश में इस बार सेब सीजन की कमजोरी ने बागवानों से लेकर व्यापारियों, मजदूरों और परिवहन कारोबार से जुड़े लोगों तक को प्रभावित किया है। अब सीजन के अंतिम चरण में किन्नौर से आने वाली खेपों पर नजर रहेगी। वास्तविक नुकसान का पता सीजन समाप्त होने के बाद चलेगा, लेकिन मौजूदा अनुमान बताते हैं कि सेब कारोबार में आई गिरावट प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।



