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हिमाचल में डिजिटल अरेस्ट का बढ़ता खतरा, दो साल में 5.91 करोड़ रुपये की ठगी, वरिष्ठ नागरिक साइबर ठगों के निशाने पर

➤ हिमाचल में डिजिटल अरेस्ट के 12 मामलों में 5.91 करोड़ रुपये की ठगी
➤ वरिष्ठ नागरिक साइबर ठगों के निशाने पर, पुलिस-सीबीआई अधिकारी बनकर बनाया जा रहा डर का माहौल
➤ 10 लाख से अधिक के असामान्य लेनदेन पर जांच और छह घंटे के कूलिंग-ऑफ पीरियड का सुझाव


नालागढ़ (सोलन)। हिमाचल प्रदेश में साइबर अपराध का नया और बेहद खतरनाक रूप डिजिटल अरेस्ट तेजी से पैर पसार रहा है। साइबर अपराधी तकनीक के साथ-साथ डर, सामाजिक शर्म और मानसिक दबाव का इस्तेमाल कर लोगों को अपने जाल में फंसा रहे हैं। खास तौर पर वरिष्ठ नागरिक इनके निशाने पर हैं। वर्ष 2024 और 2025 के दौरान प्रदेश में डिजिटल अरेस्ट के 12 मामले सामने आए, जिनमें पीड़ितों से करीब 5.91 करोड़ रुपये की ठगी की गई। वहीं, वर्ष 2025 में प्रदेश में कुल 18,706 साइबर अपराध शिकायतें दर्ज हुईं।

डिजिटल अरेस्ट की ठगी में अपराधी पहले फोन कॉल या वीडियो कॉल के माध्यम से पीड़ित से संपर्क करते हैं। इसके बाद खुद को पुलिस, सीबीआई या किसी अन्य सरकारी विभाग का अधिकारी बताकर उसे भयभीत किया जाता है। कभी फर्जी वारंट दिखाया जाता है तो कभी किसी आपराधिक मामले में नाम आने की बात कही जाती है। पीड़ित को बताया जाता है कि उसके आधार कार्ड, बैंक खाते या अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों का दुरुपयोग हुआ है।

इसके बाद तथाकथित जांच के नाम पर पीड़ित को लगातार वीडियो कॉल पर बने रहने के लिए कहा जाता है। उसे परिवार के लोगों से बात करने से रोका जाता है और जांच में सहयोग के नाम पर बताए गए बैंक खाते में रकम ट्रांसफर करने का दबाव बनाया जाता है। कई मामलों में पीड़ित को यह विश्वास दिला दिया जाता है कि अगर उसने निर्देश नहीं माने तो उसकी गिरफ्तारी हो सकती है।

यही वजह है कि डिजिटल अरेस्ट की ठगी केवल तकनीकी धोखाधड़ी नहीं रह गई है। इसमें अपराधी मानसिक नियंत्रण और भय पैदा करने की रणनीति का इस्तेमाल कर रहे हैं। पीड़ित इतना डर जाता है कि वह परिवार के सदस्यों तक को इसकी जानकारी नहीं देता और देखते ही देखते लाखों रुपये गंवा बैठता है।

हमीरपुर से बिलासपुर और नालागढ़ तक सामने आए बड़े मामले

प्रदेश में सामने आए हालिया मामलों ने साइबर ठगी के इस नए तरीके की गंभीरता को उजागर किया है। हमीरपुर में एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी दंपती से 49 लाख रुपये की ठगी की गई। इसी तरह बिलासपुर में एक सेवानिवृत्त सैनिक को 98 लाख रुपये का नुकसान हुआ।

नालागढ़ में भी एक वरिष्ठ नागरिक दंपती से 72 लाख रुपये की ठगी का मामला सामने आया। इन मामलों से साफ है कि साइबर अपराधियों की नजर उन लोगों पर है जिनके पास वर्षों की बचत होती है और जो सरकारी जांच, पुलिस कार्रवाई या कानूनी प्रक्रिया के नाम पर जल्दी डर सकते हैं।

साइबर ठग पहले पीड़ित को कानूनी कार्रवाई का डर दिखाते हैं और फिर उसे इतना मानसिक दबाव देते हैं कि वह बिना किसी से सलाह किए उनके निर्देशों का पालन करने लगता है। परिवार से संपर्क तोड़ देना और लगातार वीडियो कॉल पर बनाए रखना इस ठगी के तरीके का अहम हिस्सा है।

यही मानसिक दबाव डिजिटल अरेस्ट को सामान्य ऑनलाइन ठगी से अलग और अधिक खतरनाक बनाता है। अपराधी पीड़ित के डर को लगातार बढ़ाते रहते हैं और उसे यह सोचने का मौका नहीं देते कि वह किसी भरोसेमंद व्यक्ति से सलाह ले सके।

पुलिस और सरकारी अधिकारी बनकर डराते हैं साइबर ठग

डिजिटल अरेस्ट के मामलों में साइबर अपराधियों का तरीका लगभग एक जैसा दिखाई देता है। पहले किसी सरकारी एजेंसी का नाम लिया जाता है। इसके बाद पीड़ित को बताया जाता है कि उसके दस्तावेजों या बैंक खाते का इस्तेमाल किसी गैरकानूनी गतिविधि में हुआ है।

इसके बाद फर्जी वारंट या अन्य दस्तावेज दिखाकर गिरफ्तारी का डर पैदा किया जाता है। अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई या किसी अन्य सरकारी विभाग का अधिकारी बताते हैं। पीड़ित से कहा जाता है कि जांच पूरी होने तक उसे वीडियो कॉल पर रहना होगा।

इसके बाद रकम को किसी कथित जांच खाते या सुरक्षित खाते में ट्रांसफर करने के लिए कहा जाता है। असल में यह पूरा खेल साइबर अपराधियों द्वारा तैयार किया गया जाल होता है।

वरिष्ठ नागरिकों के मामले में डर और सामाजिक शर्म का असर और ज्यादा होता है। कई बुजुर्ग यह सोचकर परिवार को नहीं बताते कि कहीं उन्हें डांट न पड़े या परिवार में उनकी प्रतिष्ठा प्रभावित न हो। साइबर अपराधी इसी मनोवैज्ञानिक कमजोरी का फायदा उठाते हैं।

परिवार बनाए विश्वास का माहौल, संदिग्ध कॉल पर तुरंत लें मदद

डिजिटल अरेस्ट से बचाव में परिवार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। वरिष्ठ नागरिकों के साथ ऐसा विश्वास का माहौल बनाया जाना चाहिए कि वे किसी भी संदिग्ध फोन कॉल, वीडियो कॉल या संदेश की जानकारी बिना झिझक परिवार के सदस्यों को दे सकें।

अगर कोई व्यक्ति खुद को पुलिस, सीबीआई या किसी सरकारी विभाग का अधिकारी बताकर फोन करे और गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई का डर दिखाए तो सबसे पहले तुरंत कॉल काट देनी चाहिए। इसके बाद परिवार के सदस्यों से बात करनी चाहिए और मामले की जानकारी साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर देनी चाहिए।

साइबर ठगी में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। घटना की सूचना जितनी जल्दी दी जाती है, रकम को संबंधित खातों में फ्रीज कराने की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है। इसलिए ठगी होने के बाद शर्म या डर के कारण चुप रहने के बजाय तत्काल शिकायत करना जरूरी है।

साइबर ठगी रोकने में बैंकों की भूमिका भी अहम

डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों को रोकने में बैंकिंग व्यवस्था की भूमिका भी लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। अब केवल ग्राहकों को ओटीपी, पासवर्ड या बैंक संबंधी गोपनीय जानकारी साझा न करने की सलाह देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

भारतीय रिजर्व बैंक ने इस दिशा में कई व्यवस्थाओं को मजबूत किया है। मूल बैंक खातों की पहचान के लिए एएमएल आधारित फ्रॉड हंटर जैसी व्यवस्था विकसित की गई है। इसके साथ ही बैंकों में फ्रॉड रिस्क मैनेजमेंट और अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है।

इन प्रणालियों का उद्देश्य असामान्य और संदिग्ध लेनदेन को शुरुआती स्तर पर पहचानना है। बैंकिंग संस्थानों को इन प्रणालियों का प्रभावी इस्तेमाल करना होगा ताकि किसी ग्राहक के खाते से अचानक बड़ी रकम ट्रांसफर होने की स्थिति में समय रहते हस्तक्षेप किया जा सके।

खास तौर पर वरिष्ठ नागरिकों के खातों में होने वाले असामान्य लेनदेन पर अतिरिक्त सतर्कता संभावित नुकसान को कम करने में मदद कर सकती है।

बैंक अधिकारियों की सतर्कता से 55 लाख रुपये की ठगी टली

साइबर ठगी के बढ़ते मामलों के बीच बैंक अधिकारियों की सतर्कता का एक सकारात्मक उदाहरण भी सामने आया है। एक 78 वर्षीय जमाकर्ता 55 लाख रुपये की संभावित ठगी से बच गया। बैंक अधिकारियों की सतर्कता के कारण समय रहते संभावित नुकसान को टाल दिया गया।

इस तरह के मामलों से यह स्पष्ट होता है कि यदि बैंक कर्मचारी किसी असामान्य लेनदेन को लेकर समय रहते सवाल उठाएं और ग्राहक से वास्तविक स्थिति की पुष्टि करें तो साइबर ठगी को रोका जा सकता है।

दूसरी ओर, साइबर ठग लगातार खुद को पुलिस अधिकारी बताकर लोगों को फोन कर रहे हैं। गिरफ्तारी का डर दिखाकर रकम ट्रांसफर कराने की कोशिश की जा रही है। ऐसे मामलों में बैंक और परिवार का समय पर हस्तक्षेप बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

10 लाख रुपये से अधिक के असामान्य लेनदेन पर तत्काल जांच का सुझाव

भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक अश्वनी घई ने वरिष्ठ नागरिकों के बैंक खातों की सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त व्यवस्था की जरूरत बताई है। उन्होंने सुझाव दिया है कि 10 लाख रुपये से अधिक की असामान्य राशि के हस्तांतरण पर तत्काल जोखिम जांच की जानी चाहिए।

उनके अनुसार, ऐसे मामलों में लाभार्थी खाते की जांच की जाए। यदि लेनदेन संदिग्ध नजर आता है तो उसे रोककर ग्राहक से पुष्टि की जानी चाहिए। इससे बैंकिंग सिस्टम में संदिग्ध ट्रांजेक्शन को शुरुआती स्तर पर ही पकड़ने और संभावित ठगी को रोकने में मदद मिल सकती है।

यह व्यवस्था विशेष रूप से उन मामलों में उपयोगी हो सकती है जहां कोई वरिष्ठ नागरिक अचानक बड़ी रकम किसी नए या असामान्य खाते में ट्रांसफर करने का प्रयास करता है।

छह घंटे का कूलिंग-ऑफ पीरियड भी सुझाया

पंजाब नेशनल बैंक से सेवानिवृत्त मुख्य प्रबंधक एसआर रघुवंशी ने डिजिटल ठगी से बचाव के लिए छह घंटे के कूलिंग-ऑफ पीरियड का सुझाव दिया है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह होगा कि किसी संदिग्ध या असामान्य लेनदेन के दौरान ग्राहक को तुरंत रकम ट्रांसफर करने के बजाय कुछ समय मिले। इस दौरान वह अपने परिवार के सदस्यों से बात कर सके और लेनदेन की वास्तविकता की पुष्टि कर सके।

डिजिटल अरेस्ट में साइबर अपराधी पीड़ित को सोचने या किसी से सलाह लेने का समय नहीं देते। ऐसे में कुछ घंटों का अतिरिक्त समय कई मामलों में लाखों रुपये की ठगी रोकने में अहम भूमिका निभा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी डिजिटल अरेस्ट मामलों पर दिए दिशा-निर्देश

डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2026 में ऐसे मामलों से निपटने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक से मूल खातों और शिकायत निवारण के लिए मानक प्रक्रिया तैयार करने को कहा है।

डिजिटल अरेस्ट के मामले यह संकेत दे रहे हैं कि साइबर अपराध से लड़ाई केवल पुलिस या साइबर सेल तक सीमित नहीं रह सकती। इसमें बैंक, पुलिस, नियामक संस्थाएं, परिवार और आम नागरिक, सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है।

साइबर अपराधी लगातार अपने तौर-तरीके बदल रहे हैं। ऐसे में आम लोगों को भी यह समझना जरूरी है कि कोई भी सरकारी एजेंसी केवल फोन या वीडियो कॉल पर दबाव बनाकर रकम किसी खाते में ट्रांसफर करने के लिए नहीं कहती। अगर कोई व्यक्ति पुलिस अधिकारी या किसी सरकारी एजेंसी का नाम लेकर गिरफ्तारी का डर दिखाए और पैसे भेजने को कहे तो यह साइबर ठगी का बड़ा संकेत हो सकता है।

डर नहीं, सतर्कता है डिजिटल अरेस्ट से बचने का सबसे बड़ा हथियार

हिमाचल में सामने आए डिजिटल अरेस्ट के मामले बताते हैं कि साइबर अपराधियों ने अब लोगों की मनोवैज्ञानिक कमजोरियों को ठगी का हथियार बना लिया है। 12 मामलों में 5.91 करोड़ रुपये की ठगी और अकेले 2025 में 18,706 साइबर अपराध शिकायतें इस चुनौती की गंभीरता को सामने रखती हैं।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए सबसे जरूरी संदेश यही है कि किसी भी अनजान कॉल पर घबराएं नहीं। पुलिस या सरकारी कार्रवाई के नाम पर वीडियो कॉल पर दबाव बनाया जाए तो कॉल काटें, परिवार से बात करें और 1930 पर शिकायत करें।

वहीं बैंकों के स्तर पर असामान्य बड़े लेनदेन की पहचान और समय रहते ग्राहक से पुष्टि जैसी व्यवस्थाएं मजबूत करना जरूरी है। विशेषज्ञों के 10 लाख रुपये से अधिक के असामान्य लेनदेन की तत्काल जांच और छह घंटे के कूलिंग-ऑफ पीरियड जैसे सुझाव इस दिशा में सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत उपलब्ध करा सकते हैं।

डिजिटल अरेस्ट के इस दौर में सबसे बड़ा बचाव यही है कि अपराधियों द्वारा पैदा किए गए डर में आकर जल्दबाजी में कोई वित्तीय फैसला न लिया जाए। सतर्कता, परिवार का सहयोग और समय पर शिकायत ही साइबर ठगों के इस नए जाल को तोड़ने का सबसे प्रभावी रास्ता है।