➤ हिमाचल ने पांच साल तक 14 फीसदी सालाना राजस्व संरक्षण मांगा
➤ पहाड़ी राज्यों के लिए अलग ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स बनाने की मांग
➤ फार्मा उद्योग के एपीआई पर जीएसटी दर घटाने का मुद्दा उठाया
शिमला। 57वीं जीएसटी परिषद की बैठक में हिमाचल प्रदेश ने राज्य के राजस्व हितों को लेकर केंद्र सरकार के सामने महत्वपूर्ण मांगें रखीं। गुरुवार को नई दिल्ली में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में हुई बैठक में प्रदेश के आबकारी सचिव डॉ. युनूस ने हिमाचल की वित्तीय स्थिति और भौगोलिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए पांच वर्ष तक 14 फीसदी सालाना राजस्व संरक्षण जारी रखने की मांग उठाई। प्रदेश का कहना है कि जीएसटी सुधारों से करदाताओं को राहत मिलनी चाहिए, लेकिन इन बदलावों का प्रतिकूल असर हिमाचल के राजस्व पर नहीं पड़ना चाहिए। राज्य ने यह भी स्पष्ट किया कि राजस्व संरक्षण की व्यवस्था तय अवधि पूरी होने के साथ अचानक समाप्त नहीं होनी चाहिए, बल्कि वास्तविक राजस्व के निर्धारित स्तर तक पहुंचने तक इसे जारी रखने पर विचार किया जाना चाहिए।
बैठक में हिमाचल प्रदेश ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि राजस्व सुरक्षा को केवल एक निश्चित अवधि के आधार पर समाप्त करना राज्य के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। प्रदेश की मांग है कि पांच वर्ष की संरक्षण अवधि पूरी होने के बाद भी यदि राज्य का वास्तविक राजस्व पांचवें वर्ष के निर्धारित संरक्षित स्तर तक नहीं पहुंचता है, तो संरक्षण व्यवस्था आगे भी जारी रखी जाए। हिमाचल का तर्क राज्य की वित्तीय स्थिति और उसकी विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों से जुड़ा है।
प्रदेश ने पहाड़ी राज्यों के लिए अलग ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स (जीओएम) गठित करने की मांग भी दोहराई। हिमाचल सरकार का मानना है कि पहाड़ी राज्यों की परिस्थितियां मैदानी राज्यों से अलग हैं और इसी वजह से जीएसटी व्यवस्था में उनके लिए अलग नीतिगत दृष्टिकोण की आवश्यकता है। राज्य ने इसके पीछे परिवहन लागत, उद्योगों की प्रकृति, बाजार तक पहुंच और सीमित राजस्व क्षमता जैसे महत्वपूर्ण कारणों को रखा।
हिमाचल की ओर से बैठक में यह पक्ष रखा गया कि पहाड़ी क्षेत्रों में कारोबार और औद्योगिक गतिविधियों की परिस्थितियां भौगोलिक कारणों से अलग रहती हैं। ऐसे में कर व्यवस्था तैयार करते समय इन राज्यों की व्यावहारिक चुनौतियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। इसी आधार पर प्रदेश ने पहाड़ी राज्यों के लिए अलग जीओएम के गठन की पैरवी की, ताकि इन राज्यों से जुड़े विशेष मुद्दों पर अलग से विचार किया जा सके।
57वीं जीएसटी परिषद की बैठक में हिमाचल के फार्मा उद्योग से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा भी उठाया गया। प्रदेश ने सक्रिय फार्मास्युटिकल सामग्री यानी एपीआई पर जीएसटी दर कम करने की मांग रखी। सरकार का कहना है कि इससे फार्मा उद्योग में रेट इनवर्जन की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही जमा इनपुट टैक्स क्रेडिट और रिफंड दावों के दबाव में भी कमी आने की उम्मीद जताई गई।
प्रदेश ने छोटे करदाताओं के लिए जीएसटी प्रक्रियाओं को आसान बनाने से जुड़े सुधारों का भी समर्थन किया। इनमें पंजीकरण, रिटर्न दाखिल करने, रिफंड और आकलन जैसी प्रक्रियाओं को सरल बनाने की दिशा में सुधार शामिल हैं। हिमाचल का पक्ष है कि छोटे करदाताओं के लिए कर अनुपालन की प्रक्रिया जितनी सरल और सहज होगी, उतना ही कारोबारियों के लिए व्यवस्था को समझना और उसका पालन करना आसान होगा।
बैठक में हिमाचल की ओर से रखी गई मांगों में एक तरफ राज्य के राजस्व संरक्षण को बनाए रखने पर जोर रहा, वहीं दूसरी तरफ पहाड़ी राज्यों की अलग आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप जीएसटी नीति पर विचार करने की मांग सामने आई। इसके अलावा प्रदेश के फार्मा क्षेत्र और छोटे करदाताओं से जुड़े मुद्दों को भी परिषद के समक्ष रखा गया।
कुल मिलाकर, 57वीं जीएसटी परिषद की बैठक में हिमाचल प्रदेश ने राजस्व सुरक्षा, पहाड़ी राज्यों की विशेष जरूरतों, फार्मा उद्योग और छोटे करदाताओं से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। प्रदेश की मांगों का केंद्र बिंदु यह रहा कि जीएसटी व्यवस्था में सुधार के साथ हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों की वित्तीय और भौगोलिक चुनौतियों को भी पर्याप्त महत्व दिया जाए।



