➤ हाईकोर्ट ने जूनियर के बराबर वेतन देने से इनकार किया, तहसीलदार सुभाष कुमार की याचिका खारिज
➤ पे-फिक्सेशन के अलग-अलग विकल्प चुनने से आया 4,000 रुपए का अंतर, नियम 9(2) के तहत नहीं बढ़ सकता सीनियर का वेतन
➤ 2019 में उठाया था मामला, 2020 में मांग खारिज होने के करीब छह साल बाद पहुंचे कोर्ट, देरी भी बना अहम पहलू
शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी का वेतन उसके जूनियर से कम है और इसकी वजह दोनों कर्मचारियों की ओर से वेतन निर्धारण के लिए चुने गए अलग-अलग विकल्प हैं, तो सीनियर कर्मचारी जूनियर के बराबर वेतन की मांग नहीं कर सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने चुनाव विभाग में तहसीलदार के पद पर कार्यरत सुभाष कुमार की याचिका खारिज कर दी।
दिसंबर 2025 के वेतन रिकॉर्ड के अनुसार सुभाष कुमार का मूल वेतन 65,800 रुपए था, जबकि उनके जूनियर बाल किशन का मूल वेतन 69,800 रुपए था। दोनों वर्ष 1991 में चुनाव विभाग में पटवारी के पद पर भर्ती हुए थे। इसके बाद दोनों को वर्ष 2010 में कानूनगो, 2016 में नायब तहसीलदार और मार्च 2022 में तहसीलदार के पद पर पदोन्नति मिली।
सुभाष कुमार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि उनकी सैलरी उनके जूनियर से 4,000 रुपए कम है और उनका वेतन भी बाल किशन के बराबर किया जाए। उनका आरोप था कि वर्ष 2010 में प्रमोशन के समय उन्हें वेतन निर्धारण का विकल्प नहीं दिया गया था।
वेतन में अंतर कैसे आया
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार दोनों कर्मचारियों को वेतन निर्धारण का विकल्प दिया गया था, लेकिन दोनों ने अलग-अलग विकल्प चुने। सुभाष कुमार ने 15 जून 2010 से अपना वेतन तय करवाने का विकल्प चुना, जबकि बाल किशन ने पटवारी के पद पर अगली सालाना वेतन वृद्धि मिलने के बाद, यानी 1 जनवरी 2011 से वेतन तय करवाने का विकल्प चुना। इससे बाल किशन की सैलरी सुभाष कुमार से अधिक हो गई।
जनवरी 2022 में भी चुने अलग विकल्प
जनवरी 2022 में नए वेतन नियम लागू होने पर भी दोनों ने अलग-अलग विकल्प चुने। सुभाष कुमार ने 2.59 के फैक्टर के आधार पर वेतन संशोधन का विकल्प चुना, जबकि बाल किशन ने 15 प्रतिशत वेतन वृद्धि से जुड़े दूसरे प्रावधान को अपनाया। इससे दोनों के वेतन में अंतर बना रहा।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस ज्योत्सना रिवाल दुआ ने कहा कि हिमाचल प्रदेश सिविल सर्विसेज (रिवाइज्ड पे) रूल्स, 2022 के नियम 9(2) के तहत यदि सीनियर और जूनियर के वेतन में अंतर उनके द्वारा चुने गए अलग-अलग विकल्पों के कारण आया है, तो सीनियर कर्मचारी का वेतन बढ़ाकर जूनियर के बराबर नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी पाया कि जूनियर कर्मचारी को कोई अतिरिक्त वेतन वृद्धि या एसीपी का विशेष लाभ नहीं मिला था। इसलिए वेतन में अंतर का कारण सुभाष कुमार की ओर से चुने गए विकल्प थे, न कि जूनियर को मिला कोई अतिरिक्त लाभ।
देरी से कोर्ट पहुंचने का पहलू भी अहम
सुभाष कुमार ने वर्ष 2019 में पहली बार विभाग के समक्ष वेतन अंतर का मामला उठाया था। विभाग ने वर्ष 2020 में उनकी मांग खारिज कर दी थी। इसके बाद वह करीब छह साल बाद हाईकोर्ट पहुंचे।
कर्मचारियों के लिए जरूरी जानकारी
पदोन्नति या नए वेतनमान लागू होने के समय वेतन निर्धारण का विकल्प चुनना एक अहम फैसला होता है, क्योंकि एक बार चुना गया विकल्प आगे चलकर वेतन पर स्थायी असर डाल सकता है। इसलिए विकल्प देने से पहले विभाग के वित्त या स्थापना शाखा से दोनों विकल्पों की गणना करवा लेना और लिखित में जानकारी लेना बेहतर रहता है। वेतन विसंगति का कोई मामला सामने आने पर उसे संबंधित विभाग के समक्ष समय रहते उठाना चाहिए, क्योंकि अदालत में देरी से पहुंचना भी मामले को कमजोर कर सकता है। विकल्प का फॉर्म भरते समय उसकी कॉपी अपने पास सुरक्षित रखनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी विवाद की स्थिति में वह प्रमाण के तौर पर काम आ सके।



