➤ हाईकोर्ट ने कहा, आउटसोर्स कर्मियों के भरोसे मरीज छोड़ना स्वास्थ्य अधिकारों से खिलवाड़
➤ नर्सों की आउटसोर्स भर्ती पर अदालत ने सरकार से 5 जनवरी तक हलफनामा मांगा
➤ इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 का उल्लंघन माना
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग में नर्सों की आउटसोर्स भर्ती को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि बिना विभागीय नियंत्रण वाले आउटसोर्स कर्मचारियों के भरोसे मरीजों को छोड़ना उनके स्वास्थ्य अधिकारों के साथ खिलवाड़ है।
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह 5 जनवरी तक इस मामले में हलफनामा दायर करे और स्पष्ट करे कि जब भर्ती नियमों में नियमित और अनुबंध आधार पर नियुक्ति का प्रावधान है, तो फिर आउटसोर्स माध्यम से भर्तियां क्यों की जा रही हैं।
750 पद खाली, सिर्फ 28 पर प्रक्रिया
कोर्ट के समक्ष यह तथ्य आया कि 31 जुलाई 2024 तक स्टाफ नर्सों के 750 पद खाली थे, लेकिन सरकार ने सिर्फ 28 पदों को नियमित आधार पर भरने की प्रक्रिया शुरू की। अदालत ने सवाल उठाया कि स्वीकृत पदों के बावजूद आउटसोर्स व्यवस्था का सहारा क्यों लिया जा रहा है।
शोषण और संविधान का उल्लंघन
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि आउटसोर्स प्रथा शोषण पर आधारित है। आउटसोर्स कर्मियों को नियमित कर्मचारियों की तुलना में काफी कम वेतन मिलता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। अदालत ने इसे अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत मरीजों के अधिकारों का भी हनन माना।
अनुशासनात्मक कार्रवाई संभव नहीं
कोर्ट ने कहा कि आउटसोर्स कर्मियों पर सरकारी विभाग का प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं होता, ऐसे में उनके खिलाफ प्रभावी अनुशासनात्मक कार्रवाई भी संभव नहीं है। यह स्थिति सीधे तौर पर मरीजों की सुरक्षा और स्वास्थ्य अधिकारों को प्रभावित करती है।
सरकार से कई सवाल
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी पूछा है कि
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पिछले एक साल में कितनी स्टाफ नर्सें नियमित की गईं
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क्या आउटसोर्स कर्मचारियों को नियमित करने की कोई नीति है
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अब तक कितने आउटसोर्स कर्मियों को नियमित किया गया
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क्या वित्त विभाग का 13 अक्तूबर 2022 का पत्र अब भी प्रभावी है, जिसमें आउटसोर्स सेवाएं जारी रखने के निर्देश थे
उल्लेखनीय है कि इससे पहले हाईकोर्ट ने इन भर्तियों पर रोक लगाई थी, जिसके खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर अस्थायी रोक लगाते हुए मामले का आठ सप्ताह में निपटारा करने के निर्देश दिए थे।



