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हिमाचल में 29 अक्तूबर को मनेगा करवा चौथ
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शाम 5:38 से 6:56 बजे तक रहेगा पूजा का मुहूर्त
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शुक्रास्त की मान्यता को लेकर असमंजस की स्थिति
पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में सुहागिनों का महापर्व करवा चौथ इस बार 29 अक्तूबर को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। विवाहित हिंदू महिलाओं के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखने वाले इस पावन पर्व पर महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ निर्जला व्रत रखती हैं। पर्व को लेकर राज्य भर में महिलाओं ने अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं और बाजारों में भी खासा उत्साह देखने को मिल रहा है।
शिमला के गंज बाजार स्थित ऐतिहासिक राधा कृष्ण मंदिर के पुजारी भगवती प्रसाद ने पर्व की तिथि और मुहूर्त की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि करवा चौथ की चतुर्थी तिथि 28 अक्तूबर की रात 1:06 बजे से शुरू होकर 29 अक्तूबर की रात 10:09 बजे तक रहेगी। उन्होंने बताया कि इस दिन पूजा का अत्यंत शुभ मुहूर्त शाम 5:38 बजे से 6:56 बजे तक रहेगा। इस दौरान महिलाएं विधि-विधान से माता करवा की पूजा-अर्चना कर सकेंगी।
करवा चौथ के व्रत की परंपराओं के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि इस व्रत में पांच प्रमुख परंपराओं का विशेष महत्व होता है। महिलाएं सूर्योदय से पहले पारंपरिक रूप से सरगी ग्रहण करती हैं, जिसमें फल, मिठाइयां और अन्य खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं। इसके बाद महिलाएं अपने पारिवारिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूरे दिन का संकल्प लेती हैं। शाम के समय करवा माता, भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है और व्रत कथा सुनी जाती है। अंत में रात को चंद्रमा के दर्शन कर उन्हें अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोला जाता है, हालांकि चंद्रोदय का समय अलग-अलग स्थानों पर भिन्न हो सकता है।
इस बार करवा चौथ के पावन पर्व पर शुक्रास्त से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं को लेकर भी महिलाओं के बीच काफी चर्चा और असमंजस की स्थिति बनी हुई है। पुजारी भगवती प्रसाद के अनुसार, इस विषय में अलग-अलग मत प्रचलित हैं, खासकर नवविवाहिताओं और जीवन में पहली बार यह व्रत रखने वाली महिलाओं में संशय देखा जा रहा है। जानकारी के अनुसार शुक्रास्त 28 अक्तूबर को समाप्त होने की बात कही जा रही है, जबकि कुछ मान्यताओं के अनुसार इसका सूतक 29 अक्तूबर को भी प्रभावी माना जा रहा है। पुजारियों और ज्योतिषविदों का सुझाव है कि ऐसी स्थिति में महिलाएं अपनी पारिवारिक परंपराओं, कुल रीति-रिवाजों और किसी योग्य विद्वान या विश्वसनीय पंचांग के अनुसार ही निर्णय लें।



