➤ लोकसभा में उठा ‘बंदर आतंक’ का मुद्दा, राष्ट्रीय संकट बताया गया
➤ हिमाचल में 7 साल में 2200 करोड़ का नुकसान, किसान परेशान
➤ अनुराग ठाकुर ने मांगी केंद्र से व्यापक राष्ट्रीय कार्ययोजना
नई दिल्ली से लेकर हिमाचल के गांवों तक एक ऐसी समस्या गूंज रही है, जो धीरे-धीरे आम लोगों के जीवन का हिस्सा बनती जा रही है—बंदरों का बढ़ता आतंक। लोकसभा में इस मुद्दे को उठाते हुए Anurag Singh Thakur ने इसे केवल एक राज्य की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गंभीर राष्ट्रीय संकट बताया।
नियम 377 के तहत सदन में अपनी बात रखते हुए अनुराग ठाकुर ने कहा कि खासकर हिमाचल प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्यों में बंदरों की अनियंत्रित आबादी ने किसानों की कमर तोड़ दी है। उन्होंने आंकड़ों के साथ बताया कि राज्य में पिछले सात वर्षों में करीब 2200 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है, जबकि हर साल 500 करोड़ रुपये से ज्यादा की फसल बर्बाद हो रही है।
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि 70,000 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि पर किसानों ने खेती छोड़ दी है। यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि उन परिवारों के टूटते सपनों की कहानी है, जो अपनी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर थे।
अनुराग ठाकुर ने मानव सुरक्षा पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों में हालात ऐसे हैं जहां हर दिन लोग बंदरों के हमलों का शिकार हो रहे हैं। बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, जिससे लोगों में लगातार डर और असुरक्षा का माहौल बना हुआ है।
उन्होंने इस संकट के पीछे कई कारण गिनाए—जैसे 1978 में बंदरों के निर्यात पर लगा प्रतिबंध, वनों की कटाई से प्राकृतिक आवास का खत्म होना, और प्राकृतिक शिकारी प्रजातियों की कमी। इन सब कारणों ने मिलकर बंदरों की आबादी को अनियंत्रित बना दिया है।
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए अनुराग ठाकुर ने केंद्र सरकार से तत्काल और समन्वित राष्ट्रीय कार्ययोजना बनाने की मांग की। उन्होंने सुझाव दिया कि बंदरों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए नसबंदी कार्यक्रम और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाया जाए, साथ ही प्रभावित राज्यों के साथ मिलकर समाधान तैयार किया जाए।
इसके अलावा उन्होंने किसानों के लिए समयबद्ध मुआवजा प्रणाली और जमीनी स्तर पर फसल सुरक्षा के उपाय लागू करने की भी मांग की। उनका कहना था कि राज्य सरकारें अकेले इस समस्या से नहीं निपट सकतीं, इसके लिए केंद्र को आगे आना होगा।
यह मुद्दा केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है—यह उन लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा है, जो हर दिन अपने खेत, अपने घर और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब देखना होगा कि इस आवाज पर केंद्र सरकार कितना और कितनी जल्दी कदम उठाती है।



