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चिलिंग ऑवर की कमी से सेब की फसल पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
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हिमाचल के 7000 फीट से नीचे वाले क्षेत्रों में 500-700 घंटे और ऊपर के क्षेत्रों में 800-900 घंटे चिलिंग ऑवर पूरे हुए।
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फरवरी में पर्याप्त बारिश की जरूरत, अन्यथा फसल प्रभावित हो सकती है।
हिमाचल प्रदेश में इस साल भी सेब की अच्छी फसल के लिए चिलिंग ऑवर एक बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फबारी के समय और मात्रा में आए बदलाव से बागवान चिंतित हैं। चिलिंग ऑवर पूरे न होने से पिछले तीन वर्षों से सेब के उत्पादन में गिरावट दर्ज की जा रही है। इस साल भी सर्दियों से पहले तीन महीने का सूखा पड़ा, और अब बर्फबारी और बारिश की कमी स्थिति को और जटिल बना रही है।
हिमाचल के 7000 फीट से नीचे के सेब उत्पादक क्षेत्रों में अब तक औसतन 500 से 700 घंटे चिलिंग ऑवर पूरे हुए हैं, जबकि 7000 फीट से ऊपर के क्षेत्रों में 800 से 900 घंटे चिलिंग ऑवर दर्ज किए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि तापमान में अचानक बढ़ोतरी से कुछ क्षेत्रों में चिलिंग ऑवर की संख्या में कमी आ रही है।
कुछ प्रगतिशील बागवानों ने अपने बगीचों में वेदर स्टेशन लगाए हैं, जो चिलिंग ऑवर का सटीक रिकॉर्ड रख रहे हैं। 5000 फीट की ऊंचाई वाले कुछ क्षेत्रों में सेब के पेड़ों में असमय बीमे बनने शुरू हो गए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, असमय बीमे आने से फ्लावरिंग तो अच्छी होगी, लेकिन कमजोर बीमों के कारण फलों की सेटिंग में परेशानी आ सकती है।
फरवरी में अच्छी बारिश की आवश्यकता है, जिससे जमीन में नमी बनी रहे और फलों की सेटिंग के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन सकें। बागवानी विशेषज्ञ डॉ. दिनेश ठाकुर का कहना है कि चिलिंग ऑवर पूरे होने के लिए अभी समय बाकी है और नई सेब किस्मों को कम चिलिंग ऑवर की आवश्यकता होती है।
चिलिंग ऑवर की आवश्यकता को समझना बागवानों के लिए महत्वपूर्ण है। प्रसुप्त अवस्था में न्यूनतम तापमान 7 डिग्री से कम रहने पर चिलिंग ऑवर पूरे होते हैं। बर्फबारी से यह प्रक्रिया तेज हो जाती है। स्पर किस्मों के लिए 600-700 घंटे और रॉयल डिलीशियस किस्मों के लिए 1200-1600 घंटे चिलिंग ऑवर की जरूरत होती है।
पिछले वर्षों में सेब उत्पादन (मीट्रिक टन में):
- 2022-23: 6,72,343
- 2023-24: 5,06,687
- 2024-25: 4,18,774
चिलिंग ऑवर की कमी और पर्याप्त नमी न होने से पिछले दो साल से फसल प्रभावित हो रही है। प्रोग्रेसिव ग्रोवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष लोकेंद्र सिंह बिष्ट का कहना है कि यदि फरवरी में बारिश नहीं हुई, तो इस साल भी फसल प्रभावित होने की संभावना है।



