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हाईकोर्ट की अंतरिम रोक से ग्रेच्युटी पर फिलहाल ब्रेक, दैनिक वेतनभोगी सेवा जोड़ने का मामला बड़ी पीठ में

दैनिक वेतनभोगी सेवा को ग्रेच्युटी में जोड़ने के आदेश पर हाईकोर्ट की अंतरिम रोक
बड़ी पीठ के अंतिम फैसले तक कर्मचारियों को ग्रेच्युटी राशि वितरित नहीं होगी
27 अगस्त को होगी अगली सुनवाई, पांच अन्य अपीलें भी साथ सुनी जाएंगी


शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में अंतरिम राहत देते हुए एकल न्यायाधीश के आदेश के अमल पर फिलहाल रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से दायर आवेदन स्वीकार करते हुए निर्देश दिए हैं कि मामले में जमा की गई ग्रेच्युटी राशि अगले आदेश तक संबंधित कर्मचारियों को वितरित नहीं की जाएगी।

यह मामला इस कानूनी प्रश्न से जुड़ा है कि नियमितीकरण से पहले दैनिक वेतनभोगी के रूप में दी गई सेवा अवधि को पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 के तहत ग्रेच्युटी की गणना में शामिल किया जाए या नहीं। राज्य सरकार का तर्क है कि नियमित सेवा की गणना सीसीएस पेंशन नियम, 1972 के अनुसार होती है और इस विवाद पर पहले से ही हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ मामला बड़ी पीठ (लार्जर बेंच) को भेज चुकी है।

खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि चूंकि यह मामला बड़ी पीठ के विचाराधीन है, इसलिए अंतिम निर्णय आने तक यथास्थिति बनाए रखना उचित होगा। अदालत ने इस विषय से जुड़ी पांच अन्य अपीलों को भी इसी मामले के साथ टैग करने के निर्देश दिए हैं, ताकि सभी मामलों की एक साथ सुनवाई हो सके। मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त को निर्धारित की गई है।

गौरतलब है कि 24 फरवरी को हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने वन विभाग के सेवानिवृत्त चौकीदारों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि नियमितीकरण से पहले दैनिक वेतनभोगी के रूप में दी गई सेवा अवधि को ग्रेच्युटी की गणना से बाहर नहीं रखा जा सकता। अदालत ने यह भी माना था कि लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों को केवल तकनीकी आधार पर उनके वैधानिक लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।

यह पूरा विवाद वन विभाग के सेवानिवृत्त कर्मचारियों से जुड़ा है। बीनू राम सहित अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति वर्ष 1998 में दैनिक वेतनभोगी चौकीदार के रूप में हुई थी और अगस्त 2006 में उनकी सेवाएं नियमित की गई थीं। 31 अक्तूबर 2017 को सेवानिवृत्त होने के बाद ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं होने पर कर्मचारियों ने लेबर ऑफिसर का दरवाजा खटखटाया था। लेबर ऑफिसर ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला देते हुए 2.47 लाख रुपये की ग्रेच्युटी और उस पर ब्याज देने के आदेश दिए थे, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

अब बड़ी पीठ के अंतिम निर्णय पर ही यह स्पष्ट होगा कि नियमितीकरण से पहले की दैनिक वेतनभोगी सेवा को ग्रेच्युटी की गणना में शामिल किया जाएगा या नहीं। इस फैसले का असर प्रदेश के बड़ी संख्या में वर्तमान और सेवानिवृत्त दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों पर पड़ सकता है।