Yellow rust in Himachal wheat crops: हिमाचल प्रदेश में गेहूं की फसल पर पीले रतुआ रोग का प्रकोप एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। कृषि विभाग के उपनिदेशक डॉ. शशिपाल अत्री ने किसानों को इस रोग से बचाव के लिए तुरंत ऐहतियाती कदम उठाने की अपील की है। उन्होंने बताया कि पीले रतुआ, जिसे धारीदार रतुआ भी कहा जाता है, का प्रकोप खासकर ठंड और नमी वाले मौसम में दिसंबर के मध्य से जनवरी तक अधिक रहता है।
यह रोग पत्तों पर छोटे-छोटे पीले फफोलों के रूप में प्रकट होता है, जो धीरे-धीरे पौधे की तनों और बालियों तक फैल जाता है। इससे पौधों की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया बाधित होती है, पत्तियां समय से पहले सूख जाती हैं और दाने सिकुड़ जाते हैं, जिससे पैदावार पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र हमीरपुर ने किसानों को सलाह दी है कि जैसे ही रोग के लक्षण दिखें, खेतों में प्रोपिकोनाजोल 25-ईसी फफूंदनाशक का छिड़काव करें। 1 मिलीलीटर फफूंदनाशक को 1 लीटर पानी में मिलाकर 30 लीटर घोल प्रति कनाल की दर से छिड़काव करना चाहिए। यदि रोग का प्रसार जारी रहे तो हर 15-20 दिनों के अंतराल पर छिड़काव दोहराएं।
डॉ. अत्री ने किसानों को समय-समय पर खेतों का निरीक्षण करने की सलाह दी है, विशेष रूप से ठंड और नमी के मौसम में। इसके अलावा, अगली बुवाई के लिए रोगग्रस्त खेतों से बीज नहीं रखने और रोग प्रतिरोधी किस्मों जैसे एचपीडब्ल्यू 360, एचपीडब्ल्यू 368, एचपीडब्ल्यू 373 और एचडी 3086 का उपयोग करने की सिफारिश की गई है।



