➤ हाईकोर्ट ने हिमाचल की पांच बीघा भूमि नियमितीकरण नीति को खारिज किया
➤ 28 फरवरी 2026 तक सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने का आदेश
➤ 1.65 लाख आवेदनों वाले फैसले को 23 साल बाद असंवैधानिक ठहराया गया
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पांच बीघा भूमि नियमितीकरण नीति को असंवैधानिक करार देते हुए इसे खारिज कर दिया है। यह फैसला 23 वर्षों बाद आया है, जब 2002 में तत्कालीन सरकार ने सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वाले लोगों के लिए इसे नियमित करने की नीति बनाई थी। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यह नीति संविधान और केंद्र सरकार की भूमि नीतियों के विरुद्ध है और 28 फरवरी 2026 तक ऐसे सभी अवैध कब्जों को हटाने के आदेश जारी किए हैं।
राज्य सरकार ने वर्ष 2002 में एक नीति के तहत सरकारी भूमि पर अवैध कब्जों को नियमित करने की प्रक्रिया शुरू की थी, जिसके लिए करीब 1.65 लाख लोगों ने आवेदन किया था। इसके बाद भू-राजस्व अधिनियम में संशोधन कर धारा 163-ए जोड़ी गई, जिसके तहत 5 से 20 बीघा तक की सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों को पक्का मालिकाना हक देने का प्रावधान किया गया। यह संशोधन भाजपा सरकार के कार्यकाल में लागू हुआ था।
याचिकाकर्ता पूनम गुप्ता ने इस नीति की वैधता को चुनौती देते हुए कहा था कि इससे सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग हो रहा है और भूमिहीनों के नाम पर बड़े स्तर पर अतिक्रमण को वैध बनाने का प्रयास हो रहा है। हाईकोर्ट ने माना कि सरकार को संविधान के तहत जमीनों का संरक्षण करना चाहिए, न कि सुविधा अनुसार बांटना।
केंद्र सरकार की ओर से भी तर्क दिया गया कि राज्य सरकार को इस तरह की नीति लाने का अधिकार नहीं है, और यह राष्ट्रीय हितों के विपरीत है। कोर्ट ने यह भी माना कि वर्ष 2002 में ही अगली सुनवाई तक पट्टे न देने का आदेश दिया गया था, जिसे अब जाकर पूर्ण निर्णय में बदल दिया गया।
इस ऐतिहासिक निर्णय से स्पष्ट है कि भविष्य में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण को किसी भी रूप में वैध ठहराना संभव नहीं होगा, और सरकार को भी अब पारदर्शिता और संवैधानिक दायरे में काम करना होगा।



