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मनाली-लेह मार्ग 46 दिन बाद यातायात के लिए बहाल

  • 46 दिन की मशक्कत के बाद बीआरओ ने मनाली-लेह मार्ग को किया बहाल

  • सैन्य व पर्यटक वाहनों के लिए लद्दाख की राह फिर से आसान हुई

  • ऑपरेशन सिंदूर की रणनीति में सड़क बहाली बनी अहम जरूरत


Manali-Leh Road: भारतीय सेना की रणनीतिक आवश्यकताओं और पर्यटकों की बहुप्रतीक्षित राह अब खुल गई है। सीमा सड़क संगठन (BRO) ने 46 दिनों की कड़ी मेहनत के बाद 431 किलोमीटर लंबी सामरिक महत्व की मनाली-लेह सड़क को यातायात के लिए पूरी तरह बहाल कर दिया है। यह मार्ग ऑपरेशन सिंदूर के बीच और भी अधिक अहम हो गया था, क्योंकि भारतीय सेना को लद्दाख की तरफ तेज़ी से रसद और जवानों की आवाजाही सुनिश्चित करनी थी।

सड़क का औपचारिक उद्घाटन एक भावनात्मक क्षण बन गया, जब लद्दाख के पांच वर्षीय तेनजिन देचन ने रिबन काटकर इसका शुभारंभ किया। अब वाहनों की आवाजाही फीटों ऊंची बर्फ की दीवारों के बीच से शुरू हो गई है। बीआरओ को अटल टनल के नॉर्थ पोर्टल से लेकर हिमाचल की अंतिम सीमा सरचू तक सड़क बहाल करने में लंबा संघर्ष करना पड़ा। इस अभियान को BRO की 70 आरसीसी यूनिट और कैप्टन संजय कृष्णन ने लीड किया।

मार्ग को खोलने में 30 से 50 फीट तक ऊंचे हिमखंडों को हटाना सबसे बड़ी चुनौती रही। साथ ही, 5 से 8 फीट तक की बर्फ को साफ करना भी मुश्किल भरा रहा। मिशन के दौरान बर्फबारी के चलते एक बार अभियान को पीछे लौटाकर दारचा से दोबारा शुरू करना पड़ा। करीब 12 मशीनों को इस कार्य में लगाया गया।

इस बार यह मार्ग पिछले वर्ष की तुलना में 19 दिन देरी से खोला गया है। 2024 में यह मार्ग 23 अप्रैल को बहाल हुआ था, जबकि इस बार मौसम की कठोरता और देरी से शुरू हुई बर्फबारी के चलते इसे खोलने में अधिक समय लगा।

सेना के काफिले और राशन से लदे वाहन अब इस मार्ग से तेजी से लद्दाख की ओर रवाना हो रहे हैं। इसके अलावा पर्यटकों के लिए भी यह रास्ता फिर से उपलब्ध हो गया है, जिससे लाहौल-स्पीति और बारालाचा क्षेत्र के पर्यटन को भी गति मिलेगी।

कारगिल युद्ध के हीरो ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर ने कहा कि 1999 के युद्ध के दौरान भी यह मार्ग सेना की रीढ़ बना था। उन्होंने कहा कि यह मार्ग भारत-पाकिस्तान सीमा तक रसद पहुंचाने का मुख्य आधार है और इसकी बहाली राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।