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हिमाचल में एसएफआई के कार्यक्रमों में गूंजी शहीदों के बलिदान की गाथा

एसएफआई ने 79वें स्वतंत्रता दिवस पर साम्राज्यवाद और शोषण के खिलाफ संघर्ष का संकल्प दोहराया
राज्यभर में झंडारोहण और जुलूस, शहीदों की कुर्बानियों को किया याद
अमेरिकी नीतियों और वैश्विक कारपोरेट लूट पर कड़ा हमला, लोकतंत्र और संप्रभुता की रक्षा का आह्वान



हिमाचल प्रदेश में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) ने 79वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रदेशभर में साम्राज्यवाद और शोषण के खिलाफ अपने संघर्ष को और मजबूती से जारी रखने का संकल्प दोहराया। राज्य के विभिन्न जिलों, कस्बों और गांवों में एसएफआई इकाइयों ने झंडारोहण और जुलूस आयोजित किए। इन कार्यक्रमों में शहीदों और इंकलाबी सिपाहियों की महान कुर्बानियों को याद किया गया, जिन्होंने औपनिवेशिक जुल्म के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी थी।

एसएफआई-हिमाचल के राज्य सचिव कॉमरेड सनी सैक्टा ने अपने संबोधन में कहा कि आज़ादी कोई तोहफा नहीं थी, बल्कि यह मजदूरों, किसानों, छात्रों और तरक्कीपसंद ताकतों के लंबे संघर्ष और बलिदान का परिणाम थी। वहीं, राज्य अध्यक्ष कॉमरेड अनिल ठाकुर ने कहा कि स्वतंत्रता दिवस हमें यह याद दिलाता है कि जुल्म, शोषण और साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई आज भी उतनी ही जरूरी है जितनी 1947 में थी।

एसएफआई ने अपने कार्यक्रमों में भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, अशफाकुल्ला खान और अनगिनत शहीदों को श्रद्धांजलि दी और देश-दुनिया में बढ़ती तानाशाही प्रवृत्तियों पर चिंता व्यक्त की। संगठन ने अमेरिकी साम्राज्यवादी नीतियों की कड़ी आलोचना की, खासकर हालिया टैरिफ बढ़ोतरी की, जिसने भारत की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया, महंगाई बढ़ाई और मेहनतकश जनता पर अतिरिक्त बोझ डाला। एसएफआई का कहना है कि यह आर्थिक हमले अतीत के औपनिवेशिक लूट की तरह ही वैश्विक कारपोरेट और मुनाफाखोर ताकतों के हित में हैं।

संगठन ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र, संप्रभुता और जन अधिकारों की रक्षा के लिए हमें घरेलू तानाशाही और बाहरी साम्राज्यवादी दबावों दोनों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना होगा। एसएफआई का संदेश साफ है कि स्वतंत्रता दिवस का असल मतलब सिर्फ झंडा लहराना नहीं, बल्कि शोषण और जुल्म के हर रूप के खिलाफ संघर्ष की विरासत को आगे बढ़ाना है।

एसएफआई-हिमाचल ने राज्य के सभी छात्रों और युवाओं से संगठित होकर एक सच्चे मायनों में आजाद, लोकतांत्रिक और बराबरी आधारित भारत के लिए संघर्ष करने की अपील की, जो अंदरूनी जुल्म और बाहरी साम्राज्यवाद दोनों से मुक्त हो।