➤ वन भूमि अतिक्रमण मामले में हाईकोर्ट ने प्रक्रिया की अनियमितताओं पर कड़ा संज्ञान लिया
➤ तहसीलदार भुंतर और वन अधिकारी को विस्तृत रिपोर्ट व हलफनामा दाखिल करने के निर्देश
➤ पॉक्सो मामले में 11 महीने से जेल में बंद आरोपी को हाईकोर्ट ने दी जमानत
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने न केवल वन भूमि अतिक्रमण पर बल्कि कानूनी प्रक्रियाओं में हो रही अनियमितताओं पर भी कड़ा रुख अपनाया है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने पाया कि भुंतर क्षेत्र से जुड़े एक पुराने अतिक्रमण मामले में कार्रवाई गलत तरीके से चलाई जा रही है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में देरी हो रही है।
अदालत ने तहसीलदार भुंतर को छठे प्रतिवादी और सत्या देवी को सातवें प्रतिवादी के रूप में शामिल करने का आदेश दिया है। साथ ही सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले से जुड़े सभी तथ्य और परिस्थितियों को न्यायालय के समक्ष लाना अनिवार्य है।
इसके अलावा खंडपीठ ने संभागीय वन अधिकारी और तहसीलदार भुंतर से उनके अधिकार क्षेत्र में सरकारी वन भूमि से अतिक्रमण हटाने और लंबित मामलों का विस्तृत विवरण भी पेश करने को कहा है। अदालत ने पाया कि मंडल आयुक्त मंडी ने 2016 में दिए गए अपने आदेश में सार्वजनिक परिसर अधिनियम के अंतर्गत शुरू मामले को भू-राजस्व अधिनियम में बदलने का निर्देश दिया, जो पूरी तरह गलत था। इस कारण मामला वर्षों से लंबित पड़ा है। अब इसकी अगली सुनवाई 16 सितंबर को होगी।
इसी बीच, पॉक्सो अधिनियम से जुड़े एक मामले में भी हाईकोर्ट ने अहम आदेश दिया। अदालत ने पाया कि आरोपी 11 महीने से अधिक समय से जेल में है और मुकदमे की सुनवाई में अनावश्यक देरी हो रही है। न्यायालय ने इसे मौलिक अधिकार का उल्लंघन मानते हुए आरोपी को जमानत प्रदान कर दी। अदालत ने कहा कि आरोप गंभीर अवश्य हैं, लेकिन मुकदमे की देरी आरोपी के अधिकारों का हनन है।
यह फैसला न्याय व्यवस्था में समयबद्ध सुनवाई की आवश्यकता को और अधिक मजबूती देता है तथा सरकारी अधिकारियों को यह चेतावनी भी है कि वे अदालत के आदेशों को हल्के में न लें।



