➤ कांगड़ा में मधुमक्खी पालन से किसानों की आमदनी बढ़ी
➤ 1807 किसान जुड़कर 645 मीट्रिक टन शहद का वार्षिक उत्पादन
➤ सरकार की योजनाओं और सब्सिडी से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई राह
हिमाचल प्रदेश का कांगड़ा जिला प्राकृतिक संसाधनों और अनुकूल जलवायु के कारण मधुमक्खी पालन (एपीकल्चर) का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है। यहां की पहाड़ी जलवायु, स्वच्छ पर्यावरण और फूलों से भरपूर वनस्पतियाँ मधुमक्खियों के लिए आदर्श परिस्थितियां उपलब्ध कराती हैं। यही वजह है कि मधुमक्खी पालन अब केवल किसानों की अतिरिक्त आय का साधन नहीं रह गया है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नई राह बनकर उभर रहा है।

उद्यान विभाग की मदद और सरकारी योजनाओं के सहयोग से कांगड़ा जिले में 42077 मौन वंश मौजूद हैं और करीब 1807 किसान इस कार्य से जुड़े हैं। यहां का वार्षिक शहद उत्पादन 645 मीट्रिक टन तक पहुंच चुका है। हिमाचली शहद की शुद्धता और जैविक गुणवत्ता की देशभर में मांग बढ़ रही है, जिससे किसानों की आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

इच्छी गांव के सुरेंद्र कुमार ने 700 बी-कलोनियाँ स्थापित कर सालाना लगभग 15 लाख रुपए की आमदनी अर्जित की। वहीं नगरोटा बगवां के लाल चंद 350 बी-कलोनियों से हर साल करीब 6 लाख रुपए की आय कर रहे हैं। किसानों के अनुभव साबित करते हैं कि मधुमक्खी पालन अब रोजगार और आय का भरोसेमंद साधन बन चुका है।
एसएमएस (एपीकल्चर) उत्तरी क्षेत्र कांगड़ा की डॉ. निशा मेहरा के अनुसार, मधुमक्खियों की वजह से न केवल शहद बल्कि फसलों और फलों की पैदावार 15-22% तक बढ़ जाती है, जो आर्थिक दृष्टि से शहद से भी अधिक मूल्यवान है। विभाग किसानों को 5 से 7 दिन की प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित कराकर बी-कलोनियों, बक्सों और उपकरणों पर 80% सब्सिडी प्रदान करता है। जिले में चार डेमोंस्ट्रेशन अपायरियाँ (घुरकड़ी, जाच्छ, पठियार और चैतडू) स्थापित की गई हैं, जहां से हर साल 720 किलो शहद निकाला जाता है।
सरकार की मुख्यमंत्री मधु विकास योजना के तहत किसानों को 50 मधुमक्खी कालोनियों तक उपकरण और छत्तों पर 1.76 लाख रुपये की सहायता दी जाती है। इसके अलावा बी-फलौरा पर 3500 रुपये और देसी मधुमक्खी (एपीस सिराना) पर 5000 रुपये की सहायता उपलब्ध करवाई जाती है।
उप निदेशक उद्यान विभाग डॉ. अलक्ष पठानिया का कहना है कि कांगड़ा में मधुमक्खी पालन केवल आय का जरिया नहीं रहा, बल्कि यह कृषि उत्पादकता, ग्रामीण रोजगार और किसानों की आर्थिक मजबूती का स्तंभ बन चुका है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे सरकारी योजनाओं और प्रशिक्षण का लाभ उठाकर आने वाले वर्षों में कांगड़ा को शहद उत्पादन हब बनाने में योगदान दें।



