➤ हिमाचल में इस बार मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश होने की संभावना
➤ मौसम विभाग ने जून से सितंबर के बीच वर्षा दीर्घावधि औसत से नीचे रहने का अनुमान जताया
➤ कम बारिश से कृषि, पेयजल, जलविद्युत और पर्यावरण पर पड़ सकता है असर
हिमाचल प्रदेश में आगामी दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर मौसम विभाग ने बड़ा पूर्वानुमान जारी किया है। मौसम विज्ञान केंद्र शिमला के अनुसार इस वर्ष प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में मानसून सीजन के दौरान सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। यह अनुमान ऐसे समय में आया है जब प्रदेश पहले ही भीषण गर्मी और जल संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।
मौसम विभाग के मुताबिक वर्ष 2026 में पूरे देश में मानसून सीजन के दौरान होने वाली वर्षा दीर्घावधि औसत का लगभग 90 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसमें चार प्रतिशत तक की कमी या बढ़ोतरी संभव है। वर्ष 1971 से 2020 के आंकड़ों के आधार पर पूरे देश में मानसून की औसत वर्षा 87 सेंटीमीटर मानी जाती है।
हिमाचल प्रदेश के लिए स्थिति और अधिक चिंताजनक बताई जा रही है। विभाग के अनुसार राज्य के अधिकांश क्षेत्रों में मानसूनी बारिश दीर्घावधि औसत के 92 प्रतिशत से नीचे रह सकती है, जिसे सामान्य से कम वर्षा की श्रेणी में रखा जाता है। हालांकि किन्नौर, लाहौल-स्पीति और चंबा के कुछ ऊपरी क्षेत्रों में सामान्य वर्षा होने की संभावना जताई गई है।
प्रदेश में मानसून सीजन की सामान्य वर्षा 734.4 मिलीमीटर मानी जाती है। यदि बारिश का स्तर इस औसत से काफी नीचे रहता है तो इसका सीधा प्रभाव खेती-बाड़ी, पेयजल योजनाओं, जलविद्युत उत्पादन और पर्यावरणीय संतुलन पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम वर्षा की स्थिति में सूखे का खतरा बढ़ सकता है और गर्मी का प्रभाव भी अधिक महसूस किया जा सकता है।
मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि कम बारिश के कारण जल स्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट गहरा सकता है, जबकि किसानों को सिंचाई संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। जलविद्युत परियोजनाओं के उत्पादन पर भी इसका असर पड़ सकता है, क्योंकि हिमाचल की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा बिजली उत्पादन से जुड़ा हुआ है।
विभाग ने इस चुनौती से निपटने के लिए जल संरक्षण, कुशल जल प्रबंधन, सूखा निगरानी प्रणाली को मजबूत करने और किसानों के लिए आकस्मिक योजनाएं तैयार करने की सलाह दी है। साथ ही मौसम विभाग की पूर्व चेतावनी सेवाओं का अधिकतम उपयोग करने पर भी जोर दिया गया है।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार वर्तमान में अल नीनो की स्थिति विकसित होने की संभावना बन रही है। यदि मानसून के दौरान अल नीनो प्रभावी होता है तो इससे बारिश की गतिविधियां कमजोर पड़ सकती हैं। वहीं हिंद महासागर में फिलहाल तटस्थ स्थिति बनी हुई है।
जून महीने के पूर्वानुमान की बात करें तो प्रदेश के निचले और मध्य पहाड़ी क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश की संभावना है, जबकि ऊंचे पहाड़ी इलाकों में सामान्य से अधिक वर्षा हो सकती है। जून के दौरान प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में न्यूनतम तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना जताई गई है। वहीं कांगड़ा, कुल्लू, मंडी, ऊना और किन्नौर जैसे जिलों में अधिकतम तापमान भी सामान्य से ऊपर रह सकता है।
मौसम विभाग ने यह भी कहा है कि जून के दौरान मैदानी और निचले क्षेत्रों में लू चलने वाले दिनों की संख्या सामान्य से अधिक रह सकती है। ऐसे में प्रदेशवासियों को गर्मी और जल संकट दोनों के लिए तैयार रहने की आवश्यकता होगी।



