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गुरु पूर्णिमा पर किस दिशा से मिलेगा दिव्य ज्ञान का प्रकाश? जानें

आषाढ़ पूर्णिमा पर 3 शुभ योगों का महासंयोग बन रहा है
गुरु आदित्य योग, मालव्य राजयोग और इंद्र योग आज विशेष फलदायी
पूजन का सर्वश्रेष्ठ समय सुबह 6 से 11:30 तक, चंद्रोदय शाम 7:19 पर



10 जुलाई 2025, गुरुवार को पूरे भारत में गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को आता है, जिसे व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। महर्षि वेदव्यास के जन्म दिवस के रूप में यह दिन भारतीय संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण और पूजनीय माना जाता है। वेदव्यास ने वेदों का विभाजन, महाभारत की रचना और अठारह पुराणों का सृजन कर सनातन परंपरा को गहराई दी।

गुरु पूर्णिमा न केवल शिक्षा और ज्ञान की परंपरा का पर्व है, बल्कि ईश्वर स्वरूप गुरु को स्मरण कर उनका आभार व्यक्त करने का अवसर भी है। शास्त्रों में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समकक्ष माना गया है। इस दिन भगवान शिव, विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है।

इस वर्ष गुरु पूर्णिमा पर तीन अत्यंत शुभ योग बन रहे हैं, जो इस दिन को अत्यधिक फलदायी और दुर्लभ बना रहे हैं:

  1. गुरु आदित्य योग – मिथुन राशि में सूर्य और गुरु की युति के कारण

  2. मालव्य राजयोग – शुक्र का वृषभ राशि में स्वयं की राशि में होना

  3. इंद्र योग – जो रात 9:38 बजे तक प्रभावी रहेगा

ये योग ध्यान, भक्ति, दान, व्रत और साधना के लिए अत्यंत उत्तम माने जाते हैं। इस दिन किया गया दान और पूजा कई गुना फल देता है।

गुरु पूर्णिमा 2025 का पूजन मुहूर्त
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 10 जुलाई, रात 01:37 बजे से
पूर्णिमा तिथि समापन: 11 जुलाई, रात 02:07 बजे तक
स्नान-दान मुहूर्त: सुबह 04:11 से 04:51 बजे तक
पूजन का श्रेष्ठ समय: प्रातः 06:00 बजे से 11:30 बजे तक
चंद्रोदय: शाम 07:19 बजे

गुरु पूर्णिमा पूजा विधि
– प्रातः काल स्नान कर पीले वस्त्र धारण करें
भगवान विष्णु, शिव और अपने गुरु की तस्वीर या मूर्ति के सामने आसन लगाकर बैठें
– पूजा थाली में चावल, फूल, फल, दीपक, गंगाजल, अक्षत, नारियल रखें
– भगवान विष्णु को तुलसी, पीले फूल और पंचामृत अर्पित करें
– गुरु को वस्त्र, फल और दक्षिणा दें
– पूरे दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ और ‘ॐ गुरवे नमः’ मंत्र का जाप करें
– अंत में आरती कर प्रसाद वितरण करें

गुरु पूर्णिमा का यह पावन दिन हर व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति, कृतज्ञता और आत्म-जागरण का अवसर देता है। यह पर्व हर शिष्य को गुरु के मार्गदर्शन और आशीर्वाद के प्रति आभार प्रकट करने का प्रेरणादायी दिन है।