➤ कैग रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, हिमाचल में 40,757 अवैध खनन के मामले दर्ज
➤ उद्योग विभाग की लापरवाही से करोड़ों की कम वसूली और चेक पोस्ट बेअसर
➤ आपदा, सिंचाई और वन विभाग में भी वित्तीय अनियमितताओं पर गंभीर सवाल
शिमला। हिमाचल प्रदेश विधानसभा में सोमवार को पेश हुई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने राज्य में प्रशासनिक लापरवाही और वित्तीय अनियमितताओं की गंभीर तस्वीर सामने रख दी है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 से 2023 के बीच प्रदेश में अवैध खनन के 40,757 मामले दर्ज किए गए, जो उद्योग विभाग और संबंधित एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े करते हैं।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि बिजली खपत के आधार पर रॉयल्टी का सही आकलन नहीं किया गया, जिसके चलते 27 लीज धारकों से लगभग ₹1.81 करोड़ की कम वसूली हुई। यह सीधे तौर पर सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाने वाला मामला माना जा रहा है। सीमावर्ती जिलों सोलन और ऊना में अवैध खनन और खनिजों के अवैध परिवहन को रोकने के लिए बनाई गई चेक पोस्ट भी स्टाफ की भारी कमी के कारण प्रभावी साबित नहीं हो सकीं।
कैग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया कि राज्य में खनन गतिविधियों की निगरानी के लिए तकनीकी संसाधनों का उपयोग बेहद कमजोर रहा। विभाग द्वारा हजारों वाहनों को पंजीकृत किए जाने के बावजूद RFID/GPS आधारित ट्रैकिंग सिस्टम लागू नहीं किया गया, जिससे अवैध परिवहन पर रोक लगाने में विफलता रही।
आपदा राहत फंड के उपयोग को लेकर भी रिपोर्ट में गंभीर टिप्पणियां की गई हैं। कैग के अनुसार SDRF फंड का सही उपयोग नहीं होने के कारण केंद्र सरकार ने ₹61.07 करोड़ की सहायता रोक दी। इसके अलावा ₹122.27 करोड़ की राशि नियमों के विपरीत बचत खातों में रखी गई, जिससे ब्याज का भी नुकसान हुआ। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि राहत कार्यों के लिए मिले फंड का इस्तेमाल कुछ मामलों में नए निर्माण और सामान्य मरम्मत जैसे अनधिकृत कार्यों पर किया गया।
जल शक्ति विभाग की योजनाओं पर भी रिपोर्ट ने सवाल उठाए हैं। जांचे गए क्षेत्रों में 163 स्वीकृत सिंचाई योजनाओं में से केवल 72 ही पूरी हो सकीं, जबकि देरी के कारण 18 योजनाओं की लागत ₹8.83 करोड़ बढ़ गई। इसके साथ ही ₹48.25 करोड़ के कार्यों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर ई-टेंडरिंग नियमों से बचने का मामला भी सामने आया है।
वन विभाग में कैंपा फंड के तहत नेट प्रेजेंट वैल्यू के गलत आकलन से सरकारी खजाने को ₹1.33 करोड़ का संभावित नुकसान होने की बात रिपोर्ट में कही गई है। चंबा सर्कल में वनों के गलत वर्गीकरण और बिना पूर्व अनुमति सड़कों के निर्माण को वन संरक्षण अधिनियम का उल्लंघन बताया गया है।
इसके अलावा रिपोर्ट में ₹3,324.53 करोड़ राशि से जुड़े 2,521 उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित पाए गए हैं। 2023-24 और 2024-25 तक बड़ी संख्या में उपयोगिता प्रमाणपत्र समय पर जमा नहीं किए गए, जिससे वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं।
यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि राज्य के कई विभागों में योजनाओं के क्रियान्वयन, निगरानी और वित्तीय अनुशासन में गंभीर खामियां बनी हुई हैं। विधानसभा में इस रिपोर्ट को लेकर राजनीतिक बहस तेज होने की संभावना है।



