➤ 2 मार्च की रात पूर्णिमा में होगा होलिका दहन
➤ 3 मार्च को चंद्रग्रहण और सुबह 6:21 से सूतक प्रभावी
➤ ग्रहण के कारण रंगों की होली 4 मार्च को मनाने की सलाह
इस वर्ष होली की तारीख को लेकर देशभर में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। वजह है फाल्गुन पूर्णिमा, चंद्रग्रहण और भद्राकाल का विशेष संयोग। पूर्णिमा तिथि दो दिन तक रहने और 3 मार्च को भारत में दिखाई देने वाले चंद्रग्रहण के कारण पंचांगों में मतभेद सामने आए हैं। ऐसे में आम लोगों के मन में सवाल है कि आखिर होलिका दहन कब करें और रंगों की होली किस दिन खेलें।
पंचांग गणना के अनुसार 2 मार्च की शाम करीब 5:45 बजे से पूर्णिमा तिथि प्रारंभ हो रही है, जो 3 मार्च की शाम लगभग 5 बजे तक रहेगी। धार्मिक मान्यता है कि होलिका दहन पूर्णिमा की रात्रि में ही किया जाता है। इस आधार पर 2 मार्च की रात होलिका दहन का विधान बन रहा है।
हालांकि 3 मार्च को दोपहर 3:21 बजे से शाम 6:47 बजे तक चंद्रग्रहण रहेगा और यह भारत में भी दिखाई देगा। ग्रहण दिखाई देने के कारण इसका सूतक काल भी मान्य होगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चंद्रग्रहण से 9 घंटे पहले सूतक लग जाता है। इस तरह 3 मार्च की सुबह 6:21 बजे से सूतक प्रारंभ होकर शाम 6:47 बजे ग्रहण समाप्ति तक प्रभावी रहेगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूतक और ग्रहण काल में शुभ कार्य, मांगलिक कार्यक्रम और उत्सव वर्जित माने जाते हैं। इसी कारण कई ज्योतिषाचार्य 3 मार्च को रंग-गुलाल न खेलने की सलाह दे रहे हैं। उनका मत है कि ग्रहण समाप्ति के बाद शुद्धिकरण स्नान कर अगले दिन 4 मार्च को धुलंडी या रंगों की होली मनाई जानी चाहिए।
हालांकि मध्य प्रदेश और राजस्थान के अधिकांश पंचांगों में धुलंडी 3 मार्च को ही बताई गई है। कुछ विद्वानों का तर्क है कि लोक परंपरा के अनुसार अधिकतर स्थानों पर होलिका दहन के अगले दिन ही रंगों की होली खेली जाती है, इसलिए 3 मार्च को भी होली खेलना अनुचित नहीं है।
इस बार एक और विशेष स्थिति भद्राकाल की है। 2 मार्च की शाम 5:45 बजे से भद्राकाल शुरू होकर 3 मार्च की सुबह 5:23 बजे तक रहेगा। शास्त्रों में भद्रा के मुख काल में होलिका दहन वर्जित बताया गया है। विद्वानों के अनुसार 2 और 3 मार्च की मध्य रात्रि में भद्रा पुच्छ काल लगभग 1:16 बजे से 2:25 बजे तक रहेगा। इस अवधि में होलिका दहन करना शुभ माना गया है। यदि यह संभव न हो तो 3 मार्च की सुबह सूर्योदय से पहले 6:20 बजे तक दहन किया जा सकता है।
अखिल भारतीय विद्वत परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. राजेश्वर शास्त्री मुसलगांवकर के अनुसार पूर्णिमा के साथ भद्रा होने पर भद्रा के मुख काल को छोड़कर रात्रि में होलिका दहन किया जा सकता है। वहीं काशी के विद्वानों ने भी स्पष्ट किया है कि 2 मार्च की रात होलिका दहन करना शास्त्रसम्मत और शुभ रहेगा।
ऐसे में निष्कर्ष यही निकलता है कि होलिका दहन 2 मार्च की रात, जबकि रंगों की होली 4 मार्च को मनाना अधिक उपयुक्त माना जा रहा है। हालांकि स्थानीय परंपराओं और क्षेत्रीय पंचांग के अनुसार 3 मार्च को भी होली खेलने की परंपरा कई राज्यों में निभाई जाएगी।



