➤ हिमाचल सरकार सेब पेड़ों के कटान पर रोक के लिए सुप्रीम कोर्ट जाएगी
➤ गोदावर्मन केस के हवाले से एफसीए एक्ट 1980 में राहत की याचिका दाखिल करेगी
➤ बागवानी मंत्री ने केंद्र पर आपदा राहत में भेदभाव के आरोप लगाए
पराक्रम चंद, शिमला
हिमाचल प्रदेश सरकार अब वन भूमि पर लगे सेब के पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने जा रही है। यह निर्णय बागवानी एवं राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी की अध्यक्षता में हुई हाई पावर कमेटी की बैठक में लिया गया है। सरकार का कहना है कि मानसून के दौरान पेड़ों का कटान न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक है बल्कि किसानों के हितों के खिलाफ भी है।
जगत सिंह नेगी ने स्पष्ट किया कि सरकार अवैध कब्जों के खिलाफ है, लेकिन भारी बारिश के दौरान सेब के पेड़ों का कटान उचित नहीं है। इस कटान से पर्यावरणीय नुकसान, भूमि क्षरण और खेती योग्य संपदा का विनाश हो सकता है। साथ ही, कटे हुए पेड़ों को डिस्पोज करने की कोई व्यवस्थित व्यवस्था नहीं है, जिससे और अधिक अव्यवस्था फैल सकती है।
इस मुद्दे को लेकर सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का निर्णय लिया है, जिसके लिए एडवोकेट जनरल को निर्देश दे दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त, सरकार अब एफसीए एक्ट 1980 (Forest Conservation Act) में राज्य के लिए राहत की मांग को लेकर गोदावर्मन केस का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करेगी।
गोदावर्मन केस के तहत पूर्व में दूसरे राज्यों को राहत मिली है, अब हिमाचल भी यही मांग कर रहा है ताकि पारंपरिक रूप से वन भूमि पर आश्रित लोगों को अधिकार मिल सके। इसी संदर्भ में Forest Rights Act, 2006 के तहत 2005 से पहले तीन पीढ़ियों से वन भूमि पर काबिज लोगों से लाभ लेने की अपील भी की गई है।
मंत्री नेगी ने कहा कि हजारों लोग अब भी इस कानून के प्रति जागरूक नहीं हैं और आवेदन नहीं कर रहे हैं, जिससे वे अपने वैध भूमि अधिकारों से वंचित रह जाते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने 2023 की आपदा राहत के तहत स्वीकृत 1500 करोड़ की राशि अभी तक पूरी नहीं दी है।
इसके अलावा, केंद्र ने शर्त रखी है कि पहले राज्य सरकार को 500 करोड़ खर्च करने होंगे, तभी शेष राशि जारी की जाएगी। इसे मंत्री ने हिमाचल के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करार दिया है और आपदा राहत में निष्पक्षता की मांग दोहराई है।



